वाराणसी, जिसे काशी या बनारस भी कहा जाता है, दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में गिना जाता है। यह शहर सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, अध्यात्म और इतिहास का जीवंत रूप है। यहां का मणिकर्णिका घाट मोक्ष की मान्यता से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से आत्मा को मुक्ति मिलती है। ऐसे में इस घाट से जुड़ा कोई भी बदलाव लोगों की भावनाओं को गहराई से छूता है।
क्या है मणिकर्णिका घाट पुनर्विकास परियोजना?
मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट के पुनर्विकास के लिए करीब ₹17.56 करोड़ की परियोजना शुरू की गई है। इस परियोजना को रूपा फाउंडेशन और JSW जैसे संस्थानों का सहयोग मिल रहा है।
योजना के तहत:
दोनों घाटों पर 18-18 नए चितास्थल बनाए जाएंगे
लकड़ी के भंडारण की बेहतर व्यवस्था
कचरा प्रबंधन और सफाई सुधार
श्रद्धालुओं और शोक में आए परिवारों के लिए आसान पहुंच
सरकार का कहना है कि यह काम जून 2026 तक पूरा हो जाएगा और इससे भीड़ कम होगी तथा लोगों को सुविधा मिलेगी।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
पुनर्विकास कार्य के दौरान कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें 18वीं सदी की नक्काशीदार मूर्तियां और पत्थर मलबे में पड़े दिखे। ये वही संरचनाएं मानी जा रही हैं, जिनका पुनरुद्धार कभी लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने करवाया था।
इसके बाद घाट के पुजारी, स्थानीय लोग और कई राजनीतिक नेता विरोध में सामने आए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे काशी की आध्यात्मिक विरासत पर हमला बताया।
लोगों की आपत्ति क्या है?
स्थानीय लोगों और विरोध कर रहे समूहों का कहना है कि:
विकास के नाम पर सैकड़ों साल पुरानी धार्मिक मूर्तियों को तोड़ा गया
इन्हें म्यूजियम में सुरक्षित रखा जा सकता था
पहले भी काशी में कॉरिडोर और सौंदर्यीकरण के नाम पर कई पुराने मंदिर और धरोहरें हटाई गईं
यह सब व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है
लोगों का मानना है कि काशी की पहचान उसके घाट हैं और यदि यही नष्ट हो गए, तो बनारस सिर्फ एक पर्यटन स्थल बनकर रह जाएगा।
सरकार का पक्ष क्या है?
प्रशासन और सरकार का कहना है कि:
किसी भी मुख्य देवी-देवता की मूर्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया गया
सभी पवित्र वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर रखा गया
यह काम श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए है, न कि विरासत मिटाने के लिए
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 17 जनवरी को खुद घाट का निरीक्षण किया और स्थिति का जायजा लिया।
विकास और विरासत के बीच संतुलन जरूरी
काशी जैसे शहर में विकास की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि यहां की हर ईंट, हर पत्थर इतिहास कहता है। सवाल यह नहीं है कि विकास हो या न हो, सवाल यह है कि क्या विकास विरासत को सहेजते हुए नहीं हो सकता?
लाखों लोग हर साल मोक्ष की कामना लेकर काशी आते हैं। उनकी आस्था, भरोसा और भावनाएं इन घाटों से जुड़ी हैं। ऐसे में किसी भी बदलाव से पहले संवाद, सहमति और संवेदनशीलता बेहद जरूरी है।
मणिकर्णिका घाट का मामला सिर्फ एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि यह काशी की आत्मा से जुड़ा विषय है। अगर विकास करना है, तो ऐसा विकास होना चाहिए जो इतिहास को मिटाए नहीं, बल्कि उसे सहेजकर आगे बढ़ाए। वरना आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
Report : ismatimes news desk.
