बरेली में नमाज पढ़ने पर 12 लोग हिरासत में: घर में इबादत भी अब जुर्म? योगी राज में धार्मिक आजादी पर सवाल

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दोस्तों! आजकल सोशल मीडिया पर एक खबर जोरों से वायरल हो रही है, वो उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से आई है। बात है मोहम्मदगंज गांव की, जहां जुम्मे की नमाज अदा करने पर पुलिस ने 12 लोगों को हिरासत में ले लिया। जी हां, एक खाली पड़े अंडर-कंस्ट्रक्शन मकान के आंगन में नमाज पढ़ रहे थे ये लोग, और लोकल लोगों की शिकायत पर पुलिस पहुंच गई। अधिकारी कह रहे हैं कि ये प्रिवेंटिव एक्शन था, ताकि गांव में कोई तनाव न फैले। लेकिन दूसरी तरफ कई लोग इसे धार्मिक आजादी पर हमला बता रहे हैं। चलिए, आज इसी बारे में डिटेल से बात करते हैं, सरल भाषा में, जैसे आपसे घर पर चर्चा कर रहा हूं।

सबसे पहले पूरा मामला क्या है? बरेली के बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गांव में एक पुराना मकान है, जो खाली पड़ा था। मालिक की परमिशन के बिना वहां कुछ लोग जुम्मे की नमाज के लिए इकट्ठा हो गए। गांव मिक्स्ड कम्युनिटी वाला है – हिंदू-मुस्लिम दोनों रहते हैं। कुछ लोकल लोगों को ये बात खटकी, उन्होंने शिकायत कर दी कि बिना इजाजत इतने लोग इकट्ठा हो रहे हैं, कहीं तनाव न हो जाए। पुलिस पहुंची, 12 लोगों को डिटेन कर लिया। तीन और लोग मौके से भाग निकले, उनकी तलाश चल रही है।

पुलिस ने इन लोगों पर पीस ब्रिच करने का चालान काटा, यानी शांति भंग करने का आरोप। फिर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, और जल्द ही बेल मिल गई। मतलब, जेल नहीं भेजा गया, बस हिरासत में लेकर छोड़ दिया। पुलिस वाले कह रहे हैं कि ये सिर्फ सावधानी थी। गांव में माहौल खराब न हो, इसलिए एक्शन लिया। एक वीडियो भी वायरल हो रहा है जिसमें नमाज पढ़ते लोग दिख रहे हैं, और पुलिस की टीम वहां पहुंचती है।

अब दूसरा पक्ष सुनिए। कई लोग इसे बहुत गलत बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर मोहम्मद जुबैर जैसे फैक्ट-चेकर और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता इसे संविधान के अनुच्छेद 25 पर अटैक कह रहे हैं। अनुच्छेद 25 तो धार्मिक आजादी की गारंटी देता है ना? अपना धर्म मानने, प्रैक्टिस करने की freedom। लोग पूछ रहे हैं – घर में या प्राइवेट जगह पर चुपचाप नमाज पढ़ना भी अब जुर्म हो गया? क्या अब इबादत के लिए भी परमिशन लेनी पड़ेगी? खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां मस्जिद दूर होती है, लोग अक्सर घर या खाली जगह पर नमाज अदा कर लेते हैं।

एक और बात जो चर्चा में आई है – सेलेक्टिव एक्शन का आरोप। इसी बरेली में कुछ दिन पहले एक कैफे इनसिडेंट हुआ था, जहां बजरंग दल से जुड़े ऋषभ ठाकुर पर आरोप लगा कि उन्होंने एक बर्थडे पार्टी में हंगामा किया, लव जिहाद का शोर मचाया। वो गुंडा एक्ट के तहत वांटेड थे, 12 दिन से ज्यादा फरार चल रहे थे। पुलिस ढूंढ रही थी, लेकिन वो खुद कोर्ट में सरेंडर कर गए। अब लोग कंपेयर कर रहे हैं – एक तरफ नमाज पढ़ने वालों को तुरंत पकड़ लिया, दूसरी तरफ हंगामा करने वाले को इतने दिन फ्री घूमने दिया? ये सवाल उठ रहे हैं कि कानून सबके लिए बराबर है या नहीं?

दोस्तों, मैंने दोनों तरफ की बातें सुनीं। पुलिस का कहना है कि शिकायत आई थी, और गांव में कम्युनल टेंशन का डर था। ऐसे मामलों में प्रिवेंटिव एक्शन लेना उनका ड्यूटी है। कोई हिंसा नहीं हुई, बस डिटेन करके छोड़ दिया। लेकिन आलोचक कह रहे हैं कि चुपचाप नमाज पढ़ना तो कोई क्राइम नहीं। अगर शिकायत पर ही एक्शन होगा, तो छोटे-छोटे धार्मिक काम भी मुश्किल हो जाएंगे। खासकर मुस्लिम कम्युनिटी में ये चिंता बढ़ गई है कि कहीं उनकी रोजमर्रा की इबादत पर भी पाबंदी न लग जाए।

सोचिए एक आम आदमी की जिंदगी में – गांव में मस्जिद नहीं या दूर है, तो जुम्मे की नमाज के लिए क्या करें? घर में या किसी खाली जगह पर इकट्ठा होकर पढ़ लें, ये तो सदियों से चलता आ रहा है। लेकिन आजकल कम्युनल टेंशन के डर से पुलिस सतर्क रहती है। सही भी है, क्योंकि छोटी बात से बड़ा बवाल हो जाता है। लेकिन सवाल ये है – बैलेंस कैसे बनाएं? धार्मिक आजादी और लॉ एंड ऑर्डर दोनों को ध्यान में रखकर।

ये मामला सिर्फ बरेली का नहीं, पूरे देश में धार्मिक फ्रीडम और कम्युनल हार्मोनी पर डिबेट छेड़ रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि प्राइवेट प्रॉपर्टी पर बिना ओनर परमिशन कुछ भी करना गलत है। दूसरी तरफ, ओनर मुस्लिम ही था (कुछ रिपोर्ट्स में हनीफ नाम आया), और वो जगह टेम्परेरी मदरसा जैसे यूज हो रही थी। फिर भी परमिशन नहीं दिखाई गई, तो पुलिस ने एक्शन लिया।

अंत में यही कहूंगा – ऐसे मामलों में दोनों कम्युनिटी को संवेदनशील रहना चाहिए। लोकल लीडर्स बातचीत से सॉल्व करें। पुलिस को भी न्यूट्रल रहकर एक्शन लेना चाहिए। आपका क्या विचार है? क्या नमाज पर एक्शन सही था या ओवर रिएक्शन? कमेंट में बताइए। अगर पोस्ट अच्छी लगी तो शेयर कीजिए, ताकि ज्यादा लोग जागरूक हों।

Report: ismatimes news desk.

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