गया जी : गया जी, बिहार में स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी पंडित यदुनंदन शर्मा की 131वीं जन्म जयंती की पूर्व संध्या पर एक भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन गया जी के डॉक्टर विवेकानंद पथ स्थित स्थल पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा और कौटिल्य मंच द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने की। उन्होंने बहुत सादे और साफ शब्दों में कहा कि पंडित यदुनंदन शर्मा केवल बीते समय के नायक नहीं हैं, बल्कि वे आज और आने वाले समय के लिए भी रास्ता दिखाने वाले महापुरुष हैं।
किसान और मजदूरों के सच्चे साथी:
डॉ. विवेकानंद मिश्र ने बताया कि पंडित यदुनंदन शर्मा की ताकत उनकी सादगी और सच्चाई थी। वे गरीब किसानों, मजदूरों और शोषित लोगों के दर्द को अपना दर्द मानते थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अंग्रेजी हुकूमत और जमींदारों के अन्याय के खिलाफ लड़ाई में लगा दी।
उनकी आवाज़ इतनी असरदार थी कि गांव-गांव में जागरूकता फैल गई। खासकर किसान और युवा उनके संघर्ष से जुड़ने लगे। यही वजह थी कि लोग उन्हें प्यार से कहते थे —
“लीहलन यदुनंदन अवतार, हरेला दुख किसान के”।
आज़ादी की लड़ाई में बड़ा नाम:
उनका आंदोलन इतना व्यापक हो गया कि देश के बड़े नेता उनसे मिलने खुद नेयामतपुर किसान आश्रम पहुंचे। पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और श्रीपाद डांगे जैसे नेता उनसे आशीर्वाद लेना सौभाग्य मानते थे।
अंग्रेजों की जेल, पुलिस की मार और जमींदारों की धमकियां — कुछ भी उनके हौसले को तोड़ नहीं सका। वे कभी अन्याय के आगे नहीं झुके।
आज़ादी के बाद उपेक्षा की पीड़ा:
डॉ. मिश्र ने दुख जताते हुए कहा कि आज़ादी के बाद की राजनीति में पंडित यदुनंदन शर्मा के साथ बहुत अन्याय हुआ। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर योजनाबद्ध तरीके से उन्हें हाशिये पर डाल दिया गया।
आज नेयामतपुर का वही आश्रम, जो कभी आज़ादी के सेनानियों की शरणस्थली था, उपेक्षा का शिकार है। यह हमारे इतिहास और संस्कृति के लिए बेहद दुखद है।
आश्रम, किताबें और खोती धरोहर:
वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य राधामोहन मिश्र ‘माधव’ ने बताया कि नेयामतपुर आश्रम की ज़मीन पंडित यदुनंदन शर्मा के नाम पर दान दी गई थी और आश्रम उन्हीं के नेतृत्व में आगे बढ़ा।
प्रो. सुनील कुमार मिश्रा ने कहा कि उनकी पत्नी कमला मिश्रा ने हर संघर्ष में उनका साथ दिया। आश्रम में बना पुस्तकालय और उनकी हस्तलिखित डायरियां आज लुप्त हो रही हैं, जो हमारी ऐतिहासिक लापरवाही को दिखाता है।
साधारण जीवन, असाधारण संघर्ष:
आचार्य सचिदानंद मिश्र ने बताया कि पंडित यदुनंदन शर्मा का जन्म मगध क्षेत्र के मंझियावां गांव में शाकद्वीपीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका जीवन सिखाता है कि ब्राह्मणत्व कर्म और सेवा से बनता है, जन्म से नहीं।
उन्होंने रेरा सत्याग्रह, सदाको आंदोलन और कई किसान आंदोलनों के जरिए किसानों को उनके अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ी।
बचपन से बनारस तक का सफर:
वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद याहिया ने बताया कि उनका जन्म वसंत पंचमी, 1896 को हुआ।
आचार्य बालमुकुंद मिश्र ने कहा कि बचपन में चरवाहे का काम करने वाले यदुनंदन शर्मा ने संघर्ष करते हुए काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
युगपुरुष की पहचान:
डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज ने कहा कि नमक सत्याग्रह, कांग्रेस संगठन, किसान सभा और समाजवादी आंदोलन में उनका योगदान उन्हें एक युगपुरुष बनाता है।
कार्यक्रम के अंत में विधायक ज्योति मांझी ने कहा कि पंडित यदुनंदन शर्मा के विचारों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाएगा और उनके बताए रास्ते पर चलकर अन्याय के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।
पंडित यदुनंदन शर्मा का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची लड़ाई सत्ता के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए होती है।
उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें।
Report: विश्वनाथ आनंद.
