दोस्तों, कल ही की बात है, 21 जनवरी 2026 को बरेली सेंट्रल जेल के दरवाजे खुले और बाहर निकला एक शख्स, जिसका नाम ही ‘आजाद’ है – आजाद खान। लेकिन ये आजादी उन्हें 25 साल की लंबी जद्दोजहद के बाद मिली। सोचिए, एक इंसान की पूरी जवानी जेल की सलाखों के पीछे बीत जाए, सिर्फ इसलिए क्योंकि सिस्टम ने गलती की। ये कहानी उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के छोटे से गांव व्योति कटरा की है, जहां आजाद खान रहते थे।
साल 2000 में एक डकैती का केस हुआ। पुलिस ने आजाद खान को पकड़ लिया, जो उस वक्त सिर्फ 21 साल के थे। न कोई ठोस सबूत, न मजबूत गवाह – फिर भी ट्रायल कोर्ट ने 2002 में उन्हें उम्रकैद की सजा सुना दी। गरीब परिवार से थे आजाद, महंगे वकील कहां से लाते? बस, जेल चले गए। बरेली जेल में साल दर साल बीतते गए। जवानी खत्म हुई, बाल सफेद हो गए, परिवार बिखर गया। भाई मस्तान ने मजदूरी करके घर चलाया और मुकदमे की पैरवी की। जेल में आजाद को दो बार मानसिक रूप से बीमार भी घोषित किया गया, इतना दर्द सहा उन्होंने।

फिर दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया – पुलिस कोई सबूत नहीं दे पाई, आजाद निर्दोष हैं, बरी किए जाते हैं। खुशी की लहर दौड़ी, लेकिन रिहाई इतनी आसान नहीं थी। कोर्ट का ऑर्डर जेल तक पहुंचने में देरी, ऊपर से 7 हजार रुपये का पुराना जुर्माना बाकी था। गरीब परिवार के लिए ये रकम पहाड़ जैसी थी। जुर्माना न भरने पर एक साल और जेल की सजा का डर! मीडिया में खबर चली, सोशल मीडिया पर हंगामा हुआ, तब जाकर एक एनजीओ ‘छोटी सी आशा’ ने मदद की और जुर्माना भरा। आखिरकार 21 जनवरी को आजाद बाहर आए।
घर पहुंचते ही रिश्तेदारों और गांव वालों का मेला लग गया। आजाद की आंखों में खुशी थी, लेकिन दर्द भी साफ दिख रहा था। उन्होंने कहा, “जिंदगी का बड़ा हिस्सा जेल में निकल गया। अब क्या बचा है?” सोचिए दोस्तों, 25 साल कोई लौटा सकता है क्या? परिवार अलग हो गया, सपने चूर हो गए। ये सिर्फ आजाद खान की कहानी नहीं, हमारे न्याय सिस्टम की उस कमजोरी की कहानी है जहां गरीब आसानी से फंस जाता है और इंसाफ आने में दशक लग जाते हैं।
मुझे तो यह कहीं से भी न्याय नहीं लगता है, एक बेकसूर की जिन्द्गगी के 25 अनमोल सालों का बदला कौन देगा। इबादत, नेकियाँ, और जवानी की कोई कीमत क्या कोई दे सकता?
गलत गिरफ्तारी करने वालों का पुस्तों तक नाश हो. मेरी तो यही बद्दुआ है बस. क्या आजाद को मुआवजा मिलेगा? उम्मीद है ये केस बदलाव लाएगा। आप क्या सोचते हैं? कमेंट में बताएं।
रिपोर्ट : मोहम्मद इस्माइल.
