कांग्रेस ने कहा – यह बजट गरीब और मध्यम वर्ग के लिए मायूस करने वाला
गया, बिहार से आम बजट 2026-27 पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज हो गई हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इस बार का बजट देश के गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। उनका आरोप है कि सरकार ने उन असली मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर दिया जिनसे आम जनता रोज़ जूझ रही है।
मोदी सरकार के कार्यकाल का यह ग्यारहवां बजट और वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन का आठवां बजट था, लेकिन बिहार कांग्रेस के अनुसार इसमें आम लोगों के लिए राहत कम और घोषणाएँ ज़्यादा दिखीं।
बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रतिनिधि सह प्रवक्ता विजय कुमार मिट्ठू ने बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दों पर ठोस कदम नज़र नहीं आए। उनका कहना है कि बजट में बड़ी-बड़ी परियोजनाओं और कॉरिडोर की बातें तो हैं, लेकिन रोज़गार बढ़ाने या कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाल करने जैसी मांगों पर कोई स्पष्ट पहल नहीं दिखाई दी।
कांग्रेस का आरोप है कि आयकर और आर्थिक नीतियों में आम नागरिक को सीधी राहत देने के बजाय बड़े कॉरपोरेट और पूंजीपति वर्ग को प्राथमिकता दी गई है। इससे मध्यम वर्ग के बीच असंतोष बढ़ सकता है।
बिहार से जुड़े अधूरे वादों पर भी सवाल
बजट पर सबसे बड़ी नाराज़गी बिहार से जुड़े मुद्दों को लेकर जताई जा रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की पुरानी मांग फिर अधूरी रह गई। पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने पर भी कोई घोषणा नहीं हुई।
गया शहर को स्मार्ट सिटी परियोजना में शामिल न किए जाने पर भी सवाल उठे हैं। साथ ही गया से बेंगलुरु, अहमदाबाद और मुंबई के लिए सीधी ट्रेन सेवा शुरू करने की मांग भी फिर टलती हुई दिखाई दी। वर्षों पहले शिलान्यास किए गए ऐरू स्टील प्रोसेसिंग प्लांट का निर्माण शुरू न होना भी नेताओं ने राज्य की अनदेखी का उदाहरण बताया।
कांग्रेस का कहना है कि बिहार की कई लंबित योजनाएँ अब भी कागज़ों में अटकी हुई हैं, जबकि जनता को उनके शुरू होने का इंतज़ार है।
“झुनझुना” वाली घोषणाओं का आरोप
नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि बिहार को केवल सांकेतिक घोषणाएँ देकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई। जहाज मरम्मत फैक्ट्री और बनारस से सिलीगुड़ी के बीच प्रस्तावित फास्ट रेलवे कॉरिडोर में बिहार का हिस्सा पड़ने जैसी बातों को उन्होंने “झुनझुना” बताया — यानी ऐसी घोषणाएँ जिनसे तत्काल ज़मीन पर कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बजट पर यह बहस आने वाले समय में और तेज होगी, खासकर उन राज्यों में जहाँ विकास और रोज़गार सबसे बड़े चुनावी मुद्दे हैं।
रिपोर्ट: विश्वनाथ आनंद.
