गया जी (बिहार): गया जिले की मिट्टी ने कई ऐसे लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने सत्ता नहीं, बल्कि अपने विचार, त्याग और राष्ट्रभक्ति से पहचान बनाई। ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे स्वर्गीय मुख्तार गोपाल मिश्र। यह बातें गयाजी जिला के वायरल सोशल मीडिया के प्रबंधक राकेश कुमार मिश्र ने मीडिया से खास बातचीत में कही।
राकेश कुमार मिश्र ने बताया कि भारत की राजनीति में बहुत कम ऐसे नाम मिलते हैं जो कुर्सी से नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों से याद किए जाते हैं। मुख्तार गोपाल मिश्र जी उसी परंपरा के प्रतिनिधि थे। वे गया जिले की धरती पर भारतीय जनसंघ की विचारधारा के पहले मजबूत दीपस्तंभ बने।
संघर्ष से साधना तक का सफर
31 अगस्त 1908 को टिकारी प्रखंड के पंचदेवता गांव में एक साधारण किसान परिवार में उनका जन्म हुआ। पिता पंडित शिवधारी मिश्र और माता बेहद सरल स्वभाव की गृहिणी थीं। आर्थिक अभावों के बावजूद गोपाल जी बचपन से ही मेधावी, मेहनती और सत्यनिष्ठ रहे।
मैट्रिक की परीक्षा में गांव में प्रथम स्थान लाकर उन्होंने सबका ध्यान खींचा। इसके बाद मां के हाथों से पाँच रुपये और पाँच सेर सत्तू लेकर वे 25 किलोमीटर दूर गया बार एसोसिएशन में मुख्तारी की पढ़ाई के लिए निकल पड़े। पढ़ाई में भी उन्होंने शीर्ष स्थान हासिल किया और जल्दी ही गरीबों, किसानों, वंचितों और शोषितों की आवाज़ बन गए। उनका निवास “लाल पाया” पूरे मगध क्षेत्र में न्याय, सत्य और निर्भीकता का प्रतीक बन गया।
राष्ट्रभक्ति और संगठन निर्माण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वैचारिक प्रभाव ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। संघ के अनुशासन और “राष्ट्र प्रथम” की भावना को उन्होंने अपने जीवन का आधार बनाया। जब 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, तब गया में संगठन की नींव रखने वाले अग्रणी नेताओं में मुख्तार गोपाल मिश्र प्रमुख थे।
वे जनसंघ के जिलाध्यक्ष बने और अपनी मेहनत से संगठन को जन-जन तक पहुँचाया। 1967 और 1969 में गया नगर विधानसभा से दो बार विधायक चुने गए। लेकिन उन्होंने खुद को कभी नेता नहीं, बल्कि जनता का सेवक माना। लोगों के सुख-दुःख में हमेशा साथ खड़े रहे और सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया।
शिक्षा और समाज सेवा के प्रति समर्पण
राजनीति से आगे बढ़कर उन्होंने गया को एक शैक्षणिक केंद्र बनाने का संकल्प लिया। उनके प्रयासों से गया आयुर्वेदिक कॉलेज, गया होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज और अनुग्रह कन्या विद्यालय की स्थापना हुई। ये संस्थान आज भी उनके समर्पण की जीती-जागती मिसाल हैं।
उनका साफ मानना था — “शिक्षा ही वह दीपक है जो समाज के अंधकार को मिटा सकता है।”
सादगी और विचारधारा का जीवन
मुख्तार गोपाल मिश्र का जीवन सादगी, ईमानदारी और विचारनिष्ठा का प्रतीक था। वे कभी पद या सत्ता के मोह में नहीं पड़े। उनकी राजनीति का मूल मंत्र था —
“राष्ट्र पहले, स्वार्थ बाद में।”
वे कहते थे राजनीति त्याग की साधना है, लाभ कमाने का साधन नहीं। उनके व्यक्तित्व में संयम, आत्मसम्मान और कर्मनिष्ठा साफ झलकती थी।
वैचारिक विरासत
उनके सान्निध्य में गया की राजनीति ने कई वैचारिक नेताओं को जन्म दिया। स्वर्गीय ईश्वर चौधरी (पूर्व सांसद) और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार जैसे नाम इसका प्रमाण हैं। मिश्र जी सिर्फ नेता नहीं थे, बल्कि विचार के शिक्षक और संस्कार देने वाले मार्गदर्शक थे।
आज जब भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी बन चुकी है, तो उसकी जड़ों में वही तप और त्याग है जिसे मुख्तार गोपाल मिश्र जैसे साधक-राजनेताओं ने सींचा था। वे भले शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श आज भी जीवित हैं।
“लोग काँटों से बचकर चलते हैं,
मैंने फूलों से ज़ख्म खाया है।”
ये पंक्तियाँ जैसे उनके जीवन को बयान करती हैं।
मुख्तार गोपाल मिश्र का जीवन सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर का दस्तावेज़ है जब राजनीति आदर्शों की साधना हुआ करती थी। उनकी सादगी, राष्ट्रनिष्ठा और सेवा भावना आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।
श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राकेश कुमार मिश्र कहते हैं —
“मुझे गर्व है कि मैं उस वंश का हिस्सा हूँ जिसने राष्ट्रसेवा को जीवन का धर्म बनाया।”
रिपोर्ट: विश्वनाथ आनंद.
