पिछले 10 सालों में 8630 शिकायतें सिटिंग जजों के खिलाफ! न्यायपालिका पर सवालिया निशान?

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प्रिय दोस्तों, आज का विषय थोड़ा गंभीर है लेकिन बेहद जरूरी। कल्पना कीजिए, हमारे देश की सबसे ऊंची अदालतें – सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट – जहां न्याय की उम्मीद की जाती है, वहां के कार्यरत जजों (सिटिंग जजों) के खिलाफ पिछले 10 सालों में 8,630 से ज्यादा शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। जी हां, यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि केंद्र सरकार ने खुद लोकसभा में यह जानकारी दी है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लिखित जवाब में कन्फर्म किया कि 2016 से 2025 तक CJI के ऑफिस में इतनी शिकायतें आई हैं।

यह संख्या सुनकर मन में सवाल उठता है – क्या हमारी न्यायपालिका पर जनता का भरोसा डगमगा रहा है? या फिर लोग ज्यादा जागरूक हो गए हैं और आवाज उठा रहे हैं? आइए इस मुद्दे को गहराई से समझते हैं।

शिकायतों का पूरा आंकड़ा क्या कहता है?

सरकार के मुताबिक, ये सभी शिकायतें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के मौजूदा जजों के खिलाफ थीं। साल-दर-साल ब्रेकडाउन देखें तो:

2016: 729 शिकायतें
2017: 682
2018: 717
2019: 1,037 (यहां से बढ़ोतरी शुरू)
2020: 518 (कोविड के कारण कम)
2021: 686
2022: 1,012
2023: 977
2024: 1,170 (सबसे ज्यादा)
2025: 1,102
कुल मिलाकर 8,630 (कुछ रिपोर्ट्स में 8,639 भी लिखा है, मामूली अंतर)। खास बात यह कि आखिरी 4 सालों (2022-2025) में कुल शिकायतों का 50% से ज्यादा हिस्सा आया है। मतलब हाल के सालों में लोग ज्यादा शिकायत कर रहे हैं।

ये शिकायतें किस तरह की हैं? ज्यादातर आचरण से जुड़ी – कथित भ्रष्टाचार, पक्षपात, देरी से फैसला, या अन्य मिसकंडक्ट। लेकिन ध्यान दें, इनमें से कितनी साबित हुईं या क्या एक्शन हुआ, यह सार्वजनिक नहीं होता।

न्यायपालिका कैसे हैंडल करती है ऐसी शिकायतें?

भारत में जजों के खिलाफ शिकायतों की जांच का तरीका “इन-हाउस मैकेनिज्म” है। यानी: सुप्रीम कोर्ट जजों या हाई कोर्ट चीफ जस्टिस के खिलाफ शिकायत CJI को जाती है।
हाई कोर्ट जजों के खिलाफ उनकी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को।
सरकार या कोई बाहर का व्यक्ति डायरेक्ट जांच नहीं कर सकता। संविधान में ज्यूडिशियरी की इंडिपेंडेंस को बचाने के लिए ऐसा सिस्टम है। लेकिन इसी वजह से पारदर्शिता की कमी का आरोप लगता है। जनता पूछती है – क्या इनमें से कितने मामलों में जजों पर कार्रवाई हुई? जवाब मिलता नहीं।

क्या यह न्यायपालिका पर सवाल है?

हां, बिल्कुल। इतनी बड़ी संख्या में शिकायतें आना मतलब जनता में असंतोष है। कुछ लोग कहते हैं कि ज्यादातर शिकायतें फर्जी या मोटिवेटेड होती हैं – जैसे हारने वाले पक्ष की तरफ से। लेकिन इतना बड़ा ट्रेंड इग्नोर नहीं किया जा सकता।

न्याय में देरी: केस सालों तक लटके रहते हैं।
कुछ हाई-प्रोफाइल मामलों में जजों पर पक्षपात के आरोप।
सोशल मीडिया के जमाने में लोग आसानी से आवाज उठा रहे हैं।
यह सब मिलकर न्यायपालिका की इमेज पर असर डालता है। विश्वास टूटे तो लोकतंत्र कमजोर होता है।

आगे क्या होना चाहिए?

पारदर्शिता बढ़ाएं: कम से कम सालाना रिपोर्ट जारी हो कि कितनी शिकायतों पर क्या एक्शन हुआ।
ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी बिल: पुराना मुद्दा है, लेकिन फिर से उठना चाहिए।
फास्ट-ट्रैक जांच: गंभीर शिकायतों (जैसे करप्शन, सेक्शुअल मिसकंडक्ट) पर तेजी से काम।
न्यायपालिका हमारे लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है। जजों का सम्मान करना जरूरी है, लेकिन जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी। अगर शिकायतें बढ़ रही हैं तो इसका मतलब सुधार की जरूरत है।

दोस्तों, आप क्या सोचते हैं? क्या इतनी शिकायतें न्यायपालिका की कमजोरी दिखाती हैं या सिर्फ जनता की जागरूकता? कमेंट में जरूर बताएं। शेयर करें ताकि इस मुद्दे पर बहस हो।

रिपोर्ट: मोहम्मद इस्माइल.

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