अपनों से अपनी बात: नववर्ष, आत्मचिंतन और सांस्कृतिक चेतना पर डॉ. विवेकानंद मिश्र का विचार

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अपनों से अपनी बात – डॉ. विवेकानंद मिश्र

गया जी (बिहार) : समय का पहिया लगातार चलता रहता है और इसी क्रम में एक और वर्ष आज अतीत के पन्नों में दर्ज हो गया। भले ही यह वर्ष परिवर्तन ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार हो, लेकिन व्यवहार में हम सभी इसे नववर्ष के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हमारा सनातन भारतीय नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वह दिन है, जब सृष्टि में नवजीवन का संचार हुआ, ब्रह्मा ने सृजन की शुरुआत की और प्रकृति स्वयं नई कोपलों के साथ नवचेतना का संदेश देती है। यह तिथि केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन और संस्कृति की आधारशिला है। इसी दिन से विक्रम संवत् का आरंभ होता है, जो हमारी वैज्ञानिक कालगणना, सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति से जुड़े जीवन का प्रमाण है।

भारतीय नववर्ष भोग-विलास का नहीं, बल्कि संयम, संकल्प और आत्मशुद्धि का पर्व है। दुर्भाग्यवश, आज हम अपनी ही सनातन परंपराओं को भूलकर परकीय तिथियों और परंपराओं को अधिक महत्व देने लगे हैं। यह केवल पर्व को भूलना नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अपनी आत्मपहचान से दूर जाना भी है।

फिर भी, यह समय केवल औपचारिक शुभकामनाएं देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह अवसर आत्मचिंतन और आत्ममंथन का है। हमें ईमानदारी से यह सोचना चाहिए कि बीते वर्ष में हमारे लक्ष्य क्यों पूरे नहीं हो पाए, कौन से प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं और किन विषयों पर हमें गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

आज यह भी जरूरी हो गया है कि हम उन कारणों को समझें, जिनके चलते पीढ़ी-दर-पीढ़ी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण होता रहा है। इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि वर्तमान समय में देश की राजनीति में सुनियोजित रूप से ब्राह्मण-विरोध की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यह केवल किसी एक समाज के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ज्ञान-परंपरा पर हमला है जिसने भारत को वेद, उपनिषद, धर्म, नीति और संस्कार दिए हैं।

यह याद रखना आवश्यक है कि ब्राह्मण कभी सत्ता का नहीं, बल्कि सदैव सत्य और ज्ञान का पक्षधर रहा है। उसने न तलवार उठाई और न ही सिंहासन की लालसा की। उसका कार्य सदियों से समाज को दिशा देना रहा है। इसलिए ब्राह्मण-विरोध वास्तव में ज्ञान-विरोध, संस्कार-विरोध और भारतीय आत्मा के विरुद्ध आघात है।

आज यह प्रश्न केवल “हमारा अपराध क्या है?” तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हमारे आत्मसम्मान और भविष्य की सुरक्षा से जुड़ गया है। ऐसी स्थिति हमें केवल सोचने के लिए नहीं, बल्कि संगठित होने, जागरूक होने और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए भी प्रेरित करती है।

नववर्ष की सच्ची भावना यही है कि हम अतीत की मजबूत नींव पर भविष्य की सुदृढ़ इमारत खड़ी करें। क्योंकि जो समाज अपने इतिहास, परंपरा और मूल्यों से कट जाता है, उसका भविष्य दिशाहीन हो जाता है। आत्मचिंतन, आत्मसम्मान और संगठन—यही नए वर्ष का वास्तविक संकल्प हो सकता है।

इन्हीं भावनाओं के साथ यह नूतन वर्ष आप सभी के लिए मंगलमय, चेतनाप्रद और संकल्प-सिद्धि का वाहक बने।

असीम शुभकामनाओं सहित।

रिपोर्ट: विश्वनाथ आनंद.

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