औरंगाबाद जिले के एक चर्चित मंदिर की खराब हालत को लेकर जब संवाददाता ने सवाल किया, तो मंगुराही गांव के रहने वाले और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले मंटू सिंह ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने इस मुद्दे पर बिहार सरकार, जिला प्रशासन और नेताओं को भी निशाने पर लिया।
मंटू सिंह ने कहा कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर साल मंदिर के नाम पर जो 25 लाख रुपये की राशि महोत्सव के लिए आती है, उसका असली इस्तेमाल आखिर होता कहां है। उनके मुताबिक यह पैसा मंदिर की मरम्मत या विकास के बजाय अधिकतर मंच सजाने और कार्यक्रम करने में खर्च हो जाता है, ताकि नेता आकर वहां भाषण दे सकें।
उन्होंने कहा कि पहले तो उन्हें इस बात का पता नहीं था, लेकिन पिछले एक-दो साल से वे देख रहे हैं कि जो भी राशि आती है, वह मंच और कार्यक्रम की तैयारियों में लगाई जाती है। उस मंच से नेता लोग बड़े-बड़े वादे करते हैं—कि यह कर देंगे, वह कर देंगे—लेकिन असल में जमीन पर कुछ खास काम दिखाई नहीं देता।
मंटू सिंह का कहना है कि 25 लाख रुपये कोई छोटी राशि नहीं होती। उन्होंने बताया कि उन्हें खुद मंदिर के कामों का अनुभव है, क्योंकि उन्होंने भी मंदिर में काफी काम करवाया है। इसके अलावा वे पेशे से कॉन्ट्रैक्टर भी हैं, इसलिए उन्हें अच्छी तरह पता है कि किस काम में कितना खर्च आता है।
उनके मुताबिक अगर केवल मंदिर की रंगाई-पुताई करनी हो तो उसमें करीब एक से डेढ़ लाख रुपये का खर्च आता है। अगर मंदिर का जीर्णोद्धार यानी मरम्मत का काम करना हो, तो उसमें करीब एक से दो लाख रुपये लगते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि लगभग पांच लाख रुपये में एक नया मंदिर भी बन सकता है, जिसमें पेंट और बाकी काम भी शामिल हो जाते हैं।
ऐसे में उनका सवाल है कि जब मंदिर से जुड़ी बुनियादी जरूरतों पर इतना कम खर्च आता है, तो फिर 25 लाख रुपये के नाम पर आखिर किया क्या जाता है। उन्होंने कहा कि यह पैसा जिन लोगों के पास जाता है, वही लोग बेहतर जानते होंगे कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है।
मंटू सिंह की इस टिप्पणी ने मंदिर की स्थिति और महोत्सव के नाम पर आने वाली राशि के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि इस मुद्दे पर प्रशासन या संबंधित जिम्मेदार लोग आगे क्या कदम उठाते हैं।
रिपोर्ट: अजय कुमार पाण्डेय.
