के. रहमान खान: छोटे शहर से राज्यसभा उपसभापति तक का प्रेरक सफर

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प्रिय दोस्तों, आज आपको एक ऐसे शख्सियत की कहानी बताने जा रहा हूं जिनका नाम है – के. रहमान खान। रहमान खान साहब राज्यसभा के उपसभापति 2004 से 2012 तक पूरे आठ साल इस कुर्सी पर रहे। वे कर्नाटक के एक छोटे से शहर कृष्णराजपेट से आते हैं। उनका जन्म 5 अप्रैल 1939 को हुआ। पिता कासिम खान साहब स्कूल टीचर थे, फिर छोटा बिजनेस किया। मां खैरुन्निसा गांव वालों का इलाज करती थीं। घर में ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन ईमानदारी और मेहनत की बातें खूब होती थीं। रहमान खान बताते हैं कि उनके पिता हमेशा कहते थे – “ईमान से काम करो, अल्लाह मदद करेगा।”

स्कूल-कॉलेज के बाद उन्होंने कॉमर्स पढ़ा और चार्टर्ड अकाउंटेंट बने। चौंकिए मत – कर्नाटक के पहले मुस्लिम चार्टर्ड अकाउंटेंट थे ये! उस जमाने में मुस्लिम लड़कों का पढ़ाई-लिखाई में इतना आगे जाना आसान नहीं था। लेकिन रहमान खान ने ठान लिया था कि कुछ बड़ा करना है।

के. रहमान खान 1978 में कर्नाटक विधान परिषद के सदस्य बने। सिर्फ चार साल बाद, 1982 में विधान परिषद के चेयरमैन बन गए – सबसे कम उम्र के चेयरमैन। इसके बाद 1990 के दशक में राज्यसभा पहुंचे। चार बार लगातार राज्यसभा सदस्य रहे। 2004 में उपसभापति बने तो पूरे देश ने देखा कि सदन कितने शांति से चल सकता है। लोग उन्हें “स्माइलिंग स्पीकर” कहते थे क्योंकि हमेशा मुस्कुराते रहते थे, गुस्सा कभी नहीं दिखाते थे।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री बने। इस दौरान वक्फ एक्ट में सुधार लाने की बहुत कोशिश की। आज भी जब वक्फ बिल की बात होती है तो उनका नाम सबसे पहले आता है। हाल ही में उन्होंने नए वक्फ अमेंडमेंट बिल की आलोचना की और कहा कि ये मुस्लिम संपत्तियों पर कब्जा करने की कोशिश है। उनकी बात में वजन है क्योंकि उन्होंने जिंदगी भर अल्पसंख्यकों के हक की लड़ाई लड़ी है।

रहमान खान सिर्फ नेता नहीं, समाजसेवी भी हैं। बेंगलुरु में झुग्गी-झोपड़ी के गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देते हैं। अच्छे स्कूलों में दाखिला, बस की सुविधा – सब फ्री। उनकी संस्था “अनुभव शिक्षा केंद्र” सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बदल रही है। वे कहते हैं, “पढ़ाई ही वो रास्ता है जिससे कोई भी समुदाय आगे बढ़ सकता है।”

एक बात जो मुझे बहुत पसंद है – वे कभी अपनी मुस्लिम पहचान को छिपाते नहीं। बल्कि गर्व से कहते हैं कि इस्लाम ने उन्हें ईमानदारी और मेहनत सिखाई। उनकी किताब “Indian Muslims: The Way Forward” में उन्होंने साफ लिखा है कि मुस्लिम समाज को आगे बढ़ने के लिए शिक्षा और एकता चाहिए, मौलवियों की पुरानी सोच नहीं। उनकी आत्मकथा “My Memoirs: Faith, Fame, Dreams & Destiny” पढ़ोगे तो रोमांच आ जाएगा – छोटे शहर का लड़का कैसे देश के बड़े पदों तक पहुंचा।

वे 85 साल की उम्र में भी सक्रिय हैं। इंटरव्यू देते हैं, किताबें लिखते हैं, समाजसेवा करते हैं। 2022 में उन्हें इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला।

दोस्तों, रहमान खान जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि धर्म, जाति या बैकग्राउंड से ऊपर उठकर देशसेवा की जा सकती है। वे कांग्रेस के पुराने और ईमानदार नेता हैं जिन्होंने कभी शोर मचाने की बजाय काम किया। अगर आप युवा हैं और राजनीति या समाजसेवा में जाना चाहते हैं तो उनकी कहानी जरूर पढ़िए। प्रेरणा मिलेगी कि सपने बड़े हों तो मेहनत से सब कुछ पाया जा सकता है।

आपको उनकी कहानी कैसी लगी? कमेंट में बताइए।

रिपोर्ट : मोहम्मद इस्माइल.

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