पूस महीना: सिर्फ ठंड और पिठ्ठा नहीं, बल्कि संघर्ष, संवेदना और संयम का प्रतीक

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पूस का महीना आते ही लोगों के मन में कड़ाके की ठंड, कोहरे भरी सुबहें और गरम-गरम पिठ्ठा की यादें ताज़ा हो जाती हैं। लेकिन पूस सिर्फ ठंड और स्वादिष्ट व्यंजनों तक सीमित नहीं है। यह महीना संघर्ष, संवेदना और संयम का भी प्रतीक है।

यह बातें टिकारी (बिहार) के केसपा निवासी, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता ई. हिमांशु शेखर ने मीडिया से बातचीत में कहीं। उन्होंने कहा कि पूस का महीना हमें जीवन में धैर्य और सहनशीलता का महत्व सिखाता है।

पूस महीना क्या है और कब आता है?

हिंदू पंचांग के अनुसार पूस, शीत ऋतु का सबसे ठंडा महीना माना जाता है। यह माह मार्गशीर्ष के बाद और माघ से पहले आता है, जो आमतौर पर दिसंबर और जनवरी के बीच पड़ता है। इस दौरान तेज ठंड, घना कोहरा और सर्द रातें आम होती हैं।

प्रकृति का यह कठोर रूप इंसान को अनुशासन, संयम और संघर्ष के साथ जीना सिखाता है।

धनुर्मास और धार्मिक महत्व

सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने के कारण पूस को धनुर्मास भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तप और संयम का महीना होता है। इसलिए इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।

पूस माह में सूर्य देव, भगवान विष्णु और पितरों की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। इस समय दान-पुण्य, तीर्थ स्नान और पितरों के लिए तर्पण करने से स्वास्थ्य, आयु और सौभाग्य में वृद्धि मानी जाती है।

किसानों के लिए पूस का महत्व

ग्रामीण जीवन में पूस का खास स्थान है। खेतों में खड़ी रबी की फसलें जैसे गेहूं, चना और सरसों किसानों की उम्मीदों का सहारा बनती हैं। कड़ाके की ठंड के बावजूद किसान मेहनत और धैर्य के साथ खेतों में लगे रहते हैं।

इसी वजह से पूस को परिश्रम, प्रतीक्षा और विश्वास का महीना कहा जाता है।

साहित्य में पूस की छवि

हिंदी साहित्य में भी पूस का जिक्र बहुत भावुक अंदाज़ में मिलता है। मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ किसान की गरीबी, मजबूरी और प्रकृति से संघर्ष को दिल छू लेने वाले रूप में दिखाती है। यह कहानी आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर देती है।

पिठ्ठा: स्वाद और परंपरा का संगम

पूस का महीना मगध क्षेत्र में पिठ्ठा के बिना अधूरा माना जाता है। चावल के आटे से बनने वाला यह व्यंजन नए धान की खुशी का प्रतीक है। इसमें चना दाल, खोवा, आलू, गुड़ और तिल जैसी भरावन डाली जाती है।

उबले हुए पिठ्ठे सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि परिवार के साथ बैठकर समय बिताने और अपनापन महसूस करने का जरिया हैं। यह दादी और मां के हाथों के स्वाद की याद दिलाते हैं।

परंपराएं क्यों जरूरी हैं?

आज के समय में पश्चिमी खानपान और आधुनिक जीवनशैली के कारण पिठ्ठा जैसी परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। यह चिंता का विषय है, क्योंकि इसके साथ हमारी सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर हो रही है।

इन परंपराओं को संभालना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना युवाओं की जिम्मेदारी है।

दान, तप और आत्मचिंतन का समय

पूस माह में ठंड के समय स्नान, सूर्य पूजा और जरूरतमंदों को कपड़े दान करने की परंपरा समाज में करुणा और संवेदनशीलता बढ़ाती है। लंबी और शांत रातें आत्मचिंतन और आत्मसंयम का मौका देती हैं।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, पूस महीना केवल ठंड और पिठ्ठा का पर्व नहीं है। यह हमें सिखाता है कि कठिन हालात में भी धैर्य, मेहनत और अपनी संस्कृति से जुड़े रहकर ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है। यही पूस का असली संदेश है।

रिपोर्ट: विश्वनाथ आनंद

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