मैं अमृत काल का भारत हूँ…
स्वछन्द सतत इच्छाओं का, जीवन निर्मित आशाओं का
अंधियारों में प्रज्वलित प्रकाश, है मुट्ठी में सारा आकाश
जन जन की आखों ने देखा, साकार हुआ वह सपना हूँ
नहीं मानवता में भेद जहाँ, नव विकसित भारत अपना हूँ
मैं अमृतकाल का भारत हूँ
है शांति सुरक्षा धर्म जहाँ, मैं उस भारत की वासी हूँ
कर्तव्य वहन ही जीवन हैं, उस जीवन की अभिलाषी हूँ
संबंधों का आदर ही नहीं, सम्मानित हर इक नारी है
हर बेटा श्रवण कुमार यहाँ, हर बेटी सीता धारी है
मैं अमृतकाल का भारत हूँ
नदियों से लेकर पर्वत तक, हर ओर यहाँ खुशहाली है
ढूंढ स्वास्थ्यय सुरक्षा तंत्र यहाँ, जग जीवन देने वाली है
धनी समृद्ध विरासत के उस देश के हम रखवाले हैं
है गर्व हमे उन सब पर जो प्राचीन प्रखर उजयालें हैं
धैर्य धरा है होटों पर हृदय विशाल सा पावक है
नहीं दुश्मन से भी बैर हमें अपने धुन के मतवाले हैं
मैं अमृतकाल का भारत हूँ
हम विश्वगुरु बन कर चमके इस दुर्गम पथ गलियारों में
जयकारों का उद्घोष यहाँ वीणा के बजते तारों में
है आत्मश्रयी हर व्यक्ति यहाँ जीवन के इन मॅझधारों में
है सत्य अहिंसा कर्मठता अब दिखती घर बाज़ारों में
मैं अमृतकाल का भारत हूँ
जो कहते थे इक भ्रम हूँ मैं, क्षण भंगुरसा इक क्रम हूँ मैं
पीढ़ी दर पीढ़ी श्रम हूँ मैं, पीड़ा से जन्मा मर्म हूँ मैं
शाश्वत अडिग अखंड हूँ मैं, सदियों में निर्मित खंड हूँ मे
मैं अमृतकाल का भारत हूँ
है लक्ष्य सभी का एक यहाँ, हो राम राज्य अभिषेक यहाँ
है विश्व विदित सन्देश यही, नहीं जग में ऐसा देश यहाँ
उन बूढी आखों ने देखा, मैं वह ही पावन सपना हूँ
ज़रा हाथ बढ़ा कर देखो तो, मैं सबका हूँ मैं अपना हूँ
मैं अमृतकाल का भारत हूँ
– उममें सादिया
