लोकतंत्र की असली ताकत जनचेतना और सामाजिक सौहार्द
गया जी (बिहार) में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बुद्धिजीवी, सुप्रसिद्ध समाजसेविका, कौटिल्य मंच एवं मानवाधिकार संगठन से जुड़ी श्रीमती सोनी मिश्रा ने जातीय हिंसा और विभाजन की राजनीति पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो शासक जातीय हिंसा की आग में हाथ सेकते हैं, उन्हें इतिहास कभी माफ नहीं करता।
उन्होंने कहा कि जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, तब लोकतंत्र का भविष्य केवल जागरूक जनमत पर ही टिका रहता है। इतिहास, साहित्य और धर्मग्रंथों में बार-बार यही संदेश दिया गया है कि अंततः न्याय, सत्य और जनचेतना ही संतुलन स्थापित करते हैं। राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर सामाजिक सौहार्द होना चाहिए, क्योंकि विभाजन नहीं, बल्कि समाधान की राजनीति ही देश को आगे ले जा सकती है।
समाज की सबसे बड़ी ताकत आपसी भाईचारा
सोनी मिश्रा ने कहा कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी पूंजी आपसी प्रेम, भाईचारा और सौहार्द रहा है। गांव हो या शहर, जाति हो या भाषा—हमारे समाज ने सदियों से मिल-जुलकर रहना सीखा है। लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज सत्ता और स्वार्थ की राजनीति इस सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने में लगी हुई है।
उन्होंने इसे एक कड़वा सच बताया कि देश की राजनीति लगातार जनता को कभी जाति, कभी भाषा, कभी क्षेत्र और कभी भावनात्मक मुद्दों के नाम पर आपस में लड़ाने की कोशिश कर रही है, ताकि शासन और सत्ता से जुड़े असली सवाल न पूछे जा सकें।
असली मुद्दे हाशिये पर
सोनी मिश्रा ने कहा कि शिक्षा में सुधार, बेरोजगारी, महंगाई, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मूलभूत सवालों को जानबूझकर पीछे धकेल दिया जाता है। सत्ता के गलियारों में अलग-अलग दलों के नेताओं के बीच सामंजस्य बना रहता है, जबकि सड़कों पर कार्यकर्ता भावनाओं में बहकर लड़ते-झगड़ते रहते हैं और अपना समय, ऊर्जा व संसाधन बर्बाद करते हैं।
इतिहास गवाह है कि सत्ता बदलती रहती है, आंदोलन आते-जाते रहते हैं, लेकिन हर बार नुकसान समाज और आम नागरिक को ही उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि आपात स्थिति में न कोई दल काम आता है, न कोई नेता, बल्कि केवल परिवार, पड़ोसी और समाज ही साथ खड़े होते हैं। इसलिए राजनीतिक मतभेद के नाम पर वर्षों पुराने रिश्तों को तोड़ देना आत्मघाती कदम है।
नागरिकों से अपील: विवेक और संयम अपनाएं
सोनी मिश्रा ने सभी नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि नेताओं की कठपुतली न बनें और राजनीतिक मतभेद को सामाजिक वैमनस्य में न बदलने दें। सत्ता से सवाल जरूर पूछें, लेकिन समाज को तोड़ने का काम न करें। उन्होंने कहा कि शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और विकास जैसे वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भावनात्मक उकसावे से दूर रहकर विवेक और संयम के साथ निर्णय लेना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
अंत में उन्होंने कहा— याद रखें, समाज बचेगा तभी लोकतंत्र बचेगा। आज जरूरत तोड़ने की नहीं, जोड़ने की राजनीति की है। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं। विचार अलग हों, पर इंसानियत एक रहे।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
