देश की आज़ादी में साहित्यकारों की अहम भूमिका – कमला प्रसाद सिंह

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गया जी (बिहार): रविवार को दखिनगांव में हिन्दी मगही साहित्यिक मंच वजीरगंज की मासिक बैठक बड़ी ही सादगी और अपनापन के साथ आयोजित की गई। माहौल पूरी तरह साहित्यिक था, लेकिन साथ ही सामाजिक सरोकारों की भी खुलकर चर्चा हुई।

मंच के संरक्षक और समाजसेवी कमला प्रसाद सिंह ने सभी साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहा कि आप सब अपनी कलम की ताकत को पहचानिए। हमारी परंपराओं को बचाना है, अपनी संस्कृति को संभालकर रखना है और साथ ही क्षेत्र की जो समस्याएँ हैं, उन्हें भी उठाना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने याद दिलाया कि देश की आज़ादी की लड़ाई में साहित्यकारों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। उनकी रचनाओं ने लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जगाई और आज़ादी की सोच को घर-घर तक पहुँचाया। उनका मानना था कि अगर हमें अपनी परंपराओं और संस्कृति को बचाना है, तो साहित्य ही सबसे मज़बूत रास्ता है।

बैठक के दौरान मंच के सदस्य दिलीप कुशवाहा ने अपनी मगही कविता सुनाई। उन्होंने होली के आने वाले त्योहार को लेकर कहा –

“होली के त्योहार आ रहलई, अजबे परब मनाव हथी,

और असली कुल के होली की है, ऐकरे समझ न पाव हथी —–।”

उनकी कविता में त्योहार की बदलती तस्वीर और असली परंपरा को समझने की बात साफ झलक रही थी।

इसके बाद पमपम कुमार पुर्नेंदु ने अपने पिता, मगही कोकिल स्वर्गीय जयराम बाबू की रचना सुनाकर सबको भावुक कर दिया। सभा में साहित्य की एक अलग ही मिठास घुल गई।

बैठक में रामचन्द्र दास, संजीत बख्तरीया, अखिलेश सिंह, निखिल कुमार, डॉ. नौलेश सिंह, सुरेन्द्र प्रसाद, मंच अध्यक्ष पंकज कुमार संजय, अमित कुमार, तपेश्वर पुरी, ललन कुमार सहित अन्य सदस्यों ने भी अपनी-अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। हर रचना में समाज, संस्कृति और परंपरा की झलक साफ दिखाई दी।

अंत में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि आगामी 1 मार्च को होली मिलन समारोह का आयोजन किया जाएगा, ताकि साहित्य और आपसी भाईचारे को और मज़बूत किया जा सके।

रिपोर्ट: विश्वनाथ आनंद.

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