दोस्तों, आजकल सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की एक खबर बहुत चर्चा में है। ये खबर पढ़कर या सुनकर दिल दुखी हो जाता है। बात है ढाबा गांव की, जहां एक शख्स अब्दुल नईम ने अपने पैसे से गांव के बच्चों के लिए स्कूल बनवाया था। लेकिन एक अफवाह ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। लोग कहने लगे कि ये “अवैध मदरसा” है, और देखते ही देखते प्रशासन ने बुलडोजर चला दिया।
अब्दुल नईम एक साधारण आदमी हैं। उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई और कुछ उधार लेकर करीब 20 लाख रुपये खर्च किए। अपनी निजी जमीन पर स्कूल की बिल्डिंग बनवाई – नाम रखा SK पब्लिक स्कूल। प्लान था नर्सरी से आठवीं क्लास तक के बच्चों को पढ़ाना। गांव में ज्यादातर आदिवासी और दलित परिवार रहते हैं, करीब 2000 की आबादी है, और मुस्लिम परिवार सिर्फ 3-4। सरकारी स्कूल दूर है, बच्चों को पढ़ाई के लिए परेशानी होती है। अब्दुल भाई का इरादा नेक था – गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, गांव आगे बढ़े। कितना अच्छा सोचा न उन्होंने?
लेकिन हुआ ये कि निर्माण चल रहा था, तभी अफवाह फैल गई। कुछ लोग कहने लगे – ये मदरसा बन रहा है, अवैध तरीके से धार्मिक शिक्षा दी जाएगी। जबकि बिल्डिंग अभी पूरी भी नहीं हुई थी, कोई क्लास शुरू नहीं हुई, कोई साइनबोर्ड नहीं लगा, कोई किताबें नहीं आईं। गांव वाले तो खुश थे। कई लोगों ने कहा – हमारे बच्चों के लिए स्कूल बन रहा है, इसमें बुराई क्या? एक स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता ने तो खुलकर सपोर्ट किया। लेकिन अफवाह ने अपना काम कर दिया।
11 जनवरी को ग्राम पंचायत ने नोटिस जारी कर दिया – बिल्डिंग खुद तोड़ो, अनुमति नहीं है। अब्दुल भाई कहते हैं कि उनके पास कुछ कागजात थे, पंचायत से NOC की बात भी चल रही थी। लेकिन 13 जनवरी को जब वो और गांव वाले कलेक्टर से मिलने गए, तब प्रशासन ने बुलडोजर चला दिया। बिल्डिंग का कुछ हिस्सा – शेड और दीवारें – गिरा दी गईं। किताबें जो आई थीं, वो भी मलबे में दब गईं। अब्दुल भाई ने कहा – “किताबें खुलने से पहले ही कुचल दी गईं।”
प्रशासन का कहना है कि निर्माण अवैध था, पंचायत से पूरी अनुमति नहीं ली गई, इसलिए कार्रवाई की। कलेक्टर साहब ने कहा – कानून के तहत एक्शन लिया गया। लेकिन गांव वाले और अब्दुल भाई कहते हैं कि अफवाह की वजह से ऐसा हुआ। गांव में सिर्फ 3-4 मुस्लिम परिवार, फिर मदरसा कैसे चलता? जांच में भी कुछ गलत नहीं मिला। फिर भी बुलडोजर क्यों?
इस पूरे मामले पर AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा – “अब्दुल की गलती यह नहीं है कि उनका स्कूल गैर-कानूनी तौर पर चल रहा है, उनके स्कूल के तमाम कागजात मौजूद हैं। गलती यह है कि वे भारतीय मुसलमान हैं और अपने गरीब, गैर-मजहबी हमवतन के लिए उनके दिल में हमदर्दी है।” ओवैसी साहब का इशारा साफ है – ये धार्मिक भेदभाव है। एक मुस्लिम शख्स गरीब हिंदू-आदिवासी बच्चों के लिए कुछ अच्छा कर रहा है, तो उसे टारगेट किया जा रहा है।
दोस्तों, ये मामला सिर्फ एक स्कूल का नहीं है। ये सवाल उठाता है हमारे समाज पर। मध्यप्रदेश में हजारों सरकारी स्कूलों की हालत खराब है – कोई बिल्डिंग नहीं, कोई शौचालय नहीं। बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ते हैं। वहां एक शख्स अपना पैसा लगाकर मदद कर रहा है, तो उसे सपोर्ट करना चाहिए न? जुर्माना लगाओ, कागजात पूरे करवाओ, लेकिन बुलडोजर क्यों? अफवाहों पर इतनी जल्दी एक्शन?
कई न्यूज रिपोर्ट्स में गांव वालों के बयान आए हैं। वो गुस्से में हैं। कह रहे हैं – हमारी मर्जी से स्कूल बन रहा था, हमारे बच्चों के लिए। किसी ने हमसे नहीं पूछा। ये तो अन्याय है। सोशल मीडिया पर भी बवाल मचा है। कुछ लोग प्रशासन का सपोर्ट कर रहे हैं – कानून सबके लिए बराबर। लेकिन ज्यादातर लोग कह रहे हैं कि ये कम्युनल एंगल है। मुस्लिम नाम सुनकर मदरसा समझ लिया, और कार्रवाई।
मैं सोचता हूं – शिक्षा तो सबका हक है। अब्दुल भाई जैसे लोग अगर आगे आते हैं, तो समाज को प्रोत्साहन देना चाहिए। अफवाह फैलाने वालों पर एक्शन हो, न कि नेक इरादे वालों पर। सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखाए। अगर कागजात में कमी थी, तो मौका दो, मदद करो। बुलडोजर तो आखिरी ऑप्शन होना चाहिए।
अब्दुल नईम का सपना टूट गया। वो उदास हैं, लेकिन गांव वाले उनके साथ हैं। उम्मीद है आगे कुछ अच्छा हो। शायद स्कूल दोबारा बने, बच्चों की पढ़ाई शुरू हो। ऐसे नेक काम करने वालों को हौसला मिले, न कि हतोत्साहन।
दोस्तों, ये घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है। क्या हमारा समाज इतना बंट चुका है कि अच्छाई भी धर्म से जोड़कर देखी जाए? नहीं न! हमें मिलकर रहना है, एक-दूसरे की मदद करनी है। शिक्षा, भाईचारा – यही आगे बढ़ाएगा हमें।
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? अफवाह की वजह से ऐसा हुआ या सिर्फ कानूनी मामला? कमेंट में बताएं। अगर पोस्ट पसंद आई तो शेयर करें, ताकि ज्यादा लोग जानें। सब्सक्राइब करना न भूलें। मिलते हैं अगली खबर में!
Report : ismatimes news desk.
