औरंगाबाद में 8 से 11 फरवरी तक सरस्वती शिशु मंदिर में प्रांतीय प्रधानाचार्य सम्मेलन

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औरंगाबाद (बिहार): जिला मुख्यालय में अदरी नदी के किनारे स्थित चर्चित विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर में 8 फरवरी 2026 से 11 फरवरी 2026 तक चार दिवसीय प्रांतीय प्रधानाचार्य सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में प्रदेश के करीब 200 विद्यालयों के प्रधानाचार्य भाग लेंगे। इसकी जानकारी विद्यालय के प्रधानाचार्य नीरज कुमार कौशिक ने एक प्रेस वार्ता के दौरान दी।

प्रेस वार्ता में गया विभाग के निरीक्षक प्रदीप कुमार कुशवाहा, भागलपुर जिला निरीक्षक उमाशंकर पोद्दार, मुंगेर विभाग के देवेंद्र कुमार, पूर्वी भाग के गंगा चौधरी, पश्चिमी भाग के परमेश्वर कुमार, सुमन कुमार सहित विद्यालय प्रबंधन से जुड़े कई लोग मौजूद रहे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर होगा विशेष मंथन
आयोजकों ने बताया कि यह कार्यक्रम भारतीय शिक्षा समिति और शिशु शिक्षा प्रबंध समिति, पटना के संयुक्त तत्वावधान में हो रहा है। सम्मेलन के दौरान चार दिनों तक प्रधानाचार्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के क्रियान्वयन पर गहराई से चर्चा करेंगे। इस दौरान विद्या भारती के कई अखिल भारतीय और क्षेत्रीय अधिकारी भी मौजूद रहेंगे।

बताया गया कि बीते सत्र की समीक्षा की जाएगी, जो 31 मार्च 2026 को समाप्त हो रहा है। इस समीक्षा में देखा जाएगा कि तय योजनाओं में कितना काम हुआ और आगे क्या सुधार की जरूरत है। साथ ही अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले नए सत्र 2026-27 की कार्ययोजना भी बनाई जाएगी। इसमें व्यावसायिक शिक्षा, कौशल विकास, तकनीक, बालक-बालिका शिक्षा और नई शैक्षणिक संरचना पर विशेष ध्यान रहेगा।

16 से ज्यादा सत्र, उद्घाटन 3 बजे
सम्मेलन का उद्घाटन 8 फरवरी को दोपहर 3 बजे होगा और 11 फरवरी को समापन होगा। इन चार दिनों में करीब 16 से 17 अलग-अलग सत्र आयोजित किए जाएंगे। हर सत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ संगठनात्मक विषयों पर भी चर्चा होगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के संदर्भ में “पंच परिवर्तन” विषय पर भी चर्चा होगी। इसमें स्व-बोध, समरसता, पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य और कुटुंब प्रबोधन जैसे विषय शामिल हैं। यह भी समीक्षा होगी कि किन विद्यालयों में इन विषयों पर काम हुआ और आगे कैसे बढ़ाया जाए।

शिक्षा के साथ संस्कार पर भी जोर
संवाददाताओं के सवाल पर नीरज कुमार कौशिक ने कहा कि शिक्षा का मकसद सिर्फ किताबों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों में संस्कार भी विकसित करना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जिक्र किया और कहा कि शिक्षा के साथ आध्यात्मिक और नैतिक अध्ययन का भी महत्व है। उनका कहना था कि सही शिक्षा इंसान के चरित्र को गढ़ती है।

उन्होंने कहा कि आज समाज में माता-पिता की सबसे बड़ी इच्छा है कि बच्चों में संस्कार हों। विद्या भारती के विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ संस्कार देने का काम भी कर रहे हैं, और यही इसकी पहचान है।

राजनीतिक सवाल पर टिप्पणी से इंकार
जब संवाददाता ने देश में शिक्षा व्यवस्था और यूजीसी से जुड़े विवादों पर सवाल पूछा तो उन्होंने विनम्रता से कहा कि वे राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी नहीं करेंगे। उन्होंने सिर्फ शिक्षा के विषय पर बोलते हुए कहा कि विद्या भारती देश का बड़ा शैक्षणिक नेटवर्क है, जिसके लगभग 25,000 औपचारिक और अनौपचारिक विद्यालय चल रहे हैं।

उन्होंने संस्कृत भाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, विज्ञान और अध्यात्म की जड़ें संस्कृत में हैं और भविष्य में भी इसकी उपयोगिता बनी रहेगी।

रिपोर्ट: अजय कुमार पाण्डेय.

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