मदनपुर प्रखंड के खिरियावा पंचायत में मुखिया प्रतिनिधि रंजीत कुमार यादव 15-16 बिगहा में परसबीम, बैगन, टमाटर, तरबूज, खरबूजा, सरसों और स्ट्रॉबेरी की शानदार खेती कर रहे हैं, लेकिन कृषि विभाग से अब तक उन्हें एक रुपया भी अनुदान नहीं मिला।
मदनपुर प्रखंड के खिरियावा पंचायत की सुबह इन दिनों कुछ अलग ही नज़र आती है। खेतों में हरियाली है, फसलें लहलहा रही हैं और मेहनत की खुशबू हवा में घुली हुई है। इस हरियाली के पीछे हैं पंचायत की मुखिया सविता देवी के प्रतिनिधि रंजीत कुमार यादव, जो इन दिनों पूरी शिद्दत और दिल से खेती में जुटे हुए हैं।
बरियावा के पास अपने ही खेत में रंजीत यादव ने करीब 15 से 16 बिगहा जमीन पर खेती की है। आम तौर पर लोग राजनीति या जनप्रतिनिधित्व में व्यस्त रहते हैं, लेकिन रंजीत यादव ने एक अलग राह चुनी है। उन्होंने खेत को ही अपनी असली पहचान बना लिया है। सब्ज़ियों से लेकर फल और तेलहन तक—हर तरह की फसल उन्होंने अपने खेत में लगाई है।
उनके खेत में परसबीम की बेलें फैली हुई हैं, बैगन के पौधे झूम रहे हैं, टमाटर की लालिमा दूर से ही नजर आ जाती है। तरबूज और खरबूजे की बेलें जमीन पर फैलकर मौसम का रंग दिखा रही हैं। वहीं सरसों की फसल हवा के साथ ऐसे लहरा रही है, जैसे कोई पीली चादर बिछ गई हो। इतना ही नहीं, उन्होंने स्ट्रॉबेरी की भी खेती शुरू की है, जो इस इलाके में अब भी कम ही देखने को मिलती है।
मंगलवार, 24 फरवरी 2026 की सुबह जब संवाददाता उनकी खेती स्थल पर पहुंचा, तो रंजीत यादव खुद खेत में मौजूद थे। कपड़ों पर मिट्टी के निशान थे, चेहरे पर हल्की थकान, लेकिन आंखों में एक अजीब सा सुकून। बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने बड़ी सादगी से अपनी बात रखी।
उन्होंने बताया कि खेती उनके लिए सिर्फ आमदनी का जरिया नहीं है, बल्कि एक जुनून है। “अगर दिल से मेहनत की जाए, तो जमीन कभी धोखा नहीं देती,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। सच भी है, 15-16 बिगहा में इस तरह की विविध खेती करना कोई आसान काम नहीं है। मेहनत, समय और लगातार देखभाल की जरूरत होती है।
लेकिन इतनी मेहनत और इतनी अच्छी फसल के बावजूद एक बात उन्हें अंदर से खलती है। रंजीत यादव का कहना है कि उन्हें अब तक कृषि विभाग की ओर से सरकारी अनुदान के तौर पर एक रुपया भी नहीं मिला है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर बिहार सरकार सही मायनों में मेहनती किसानों को अनुदान दे, तो किसानों की आर्थिक हालत काफी हद तक सुधर सकती है।
बातचीत के दौरान उन्होंने सरकारी सिस्टम पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि योजनाएं तो बहुत बनती हैं, घोषणाएं भी होती हैं, लेकिन ज़मीन पर काम करने वाले असली किसानों तक मदद समय पर नहीं पहुंचती। “अगर वाकई में खेती को बढ़ावा देना है, तो कागज़ी कार्रवाई कम होनी चाहिए और मदद सीधे किसान तक पहुंचनी चाहिए,” उन्होंने कहा।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसान के नाम पर सिर्फ सियासत नहीं होनी चाहिए। अगर किसान का जिक्र सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित रह जाएगा, तो हालात नहीं बदलेंगे। असली बदलाव तब आएगा, जब खेत में पसीना बहाने वाले किसान को उसका हक वक्त पर मिलेगा।
रंजीत यादव की बातों में कोई तल्खी नहीं थी, बल्कि एक उम्मीद थी। उम्मीद इस बात की कि सिस्टम सुधरेगा, योजनाएं सही लोगों तक पहुंचेंगी और जो किसान वाकई में मेहनत कर रहे हैं, उन्हें सम्मान और सहयोग मिलेगा।
उनकी खेती इस बात का सबूत है कि अगर इरादा मजबूत हो, तो गांव में रहकर भी नई मिसाल कायम की जा सकती है। सब्ज़ी, फल और तेलहन की एक साथ खेती कर उन्होंने यह दिखाया है कि सही योजना और मेहनत से खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है।
गांव के लोग भी उनकी इस पहल की चर्चा करते हैं। कई युवा किसान उनसे सलाह लेने पहुंचते हैं। कोई पूछता है कि स्ट्रॉबेरी की खेती कैसे की, तो कोई जानना चाहता है कि एक साथ इतनी फसलों का प्रबंधन कैसे करते हैं। रंजीत यादव हर सवाल का जवाब खुले दिल से देते हैं।
आज जब खेती को लेकर तरह-तरह की चुनौतियों की बात होती है—महंगी लागत, मौसम की मार, बाजार का उतार-चढ़ाव—ऐसे में 15-16 बिगहा में इस स्तर की खेती करना अपने आप में एक बड़ी बात है। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या मेहनती किसानों तक सरकारी योजनाओं का लाभ सही तरीके से पहुंच पा रहा है?
रंजीत यादव का मामला सिर्फ एक किसान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की भी कहानी है, जिसमें मेहनत करने वाले को कई बार अपनी हक की मदद के लिए इंतजार करना पड़ता है। उनकी मांग बहुत बड़ी नहीं है—सिर्फ इतना कि जो किसान सच में खेती कर रहे हैं, उन्हें सरकारी अनुदान ईमानदारी से मिले।
खेत की मेड़ पर खड़े होकर जब उन्होंने अपनी लहलहाती फसल की तरफ इशारा किया, तो उनके चेहरे पर गर्व साफ झलक रहा था। यह गर्व उनकी मेहनत का था। लेकिन उसी के साथ एक उम्मीद भी थी—कि शायद आने वाले दिनों में सिस्टम बदलेगा और मेहनती किसानों को उनका हक समय पर मिलेगा।
मदनपुर के खिरियावा पंचायत की यह कहानी सिर्फ हरियाली की नहीं, बल्कि उम्मीद, मेहनत और सवालों की भी है। और शायद यही सवाल किसी दिन बदलाव की शुरुआत बनें।
रिपोर्ट: अजय कुमार पाण्डेय.
