बंगाल चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष थे?

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पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। एक ओर भाजपा की ऐतिहासिक जीत है, दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी दलों का आरोप है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के जरिए मतदाता सूची से भारी संख्या में नाम काटे गए, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। इस विवाद के केंद्र में दो आईएएस अधिकारी हैं—मंजू कुमार अग्रवाल और सुब्रत गुप्ता।

SIR क्या था और कितने नाम कटे?

चुनाव आयोग ने 2025-26 में पूरे देश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कराया। इसका मकसद पुरानी, मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट और बिना दस्तावेज वाले मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को शुद्ध करना था। पश्चिम बंगाल में यह अभियान विशेष रूप से विवादास्पद रहा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बंगाल में लगभग 90-91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। इनमें से करीब 58-60 लाख नाम मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट श्रेणी में थे, जबकि 27 लाख से ज्यादा नाम “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी में थे, जिनके मामले अपीलेट ट्रिब्यूनल में लंबित रह गए। कई मतदाताओं ने दावा किया कि उनके नाम बिना सूचना कट गए, जिनमें पूर्व न्यायाधीश, वायुसेना के वेटरन, कारगिल युद्ध के सैनिक और संविधान की मूल प्रति सजाने वाले चित्रकार के पोते जैसे नाम भी शामिल बताए गए।⁠

टीएमसी का आरोप है कि यह अभियान लक्षित था, खासकर सीमा क्षेत्रों और कुछ समुदायों पर। भाजपा और चुनाव आयोग का पक्ष है कि यह सफाई जरूरी थी क्योंकि बंगाल में पिछले वर्षों में फर्जी वोटरों की शिकायतें लगातार आ रही थीं।

मंजू कुमार अग्रवाल कौन हैं?

मंजू कुमार अग्रवाल 1990 बैच के आईएएस अधिकारी (पश्चिम बंगाल कैडर) हैं। चुनाव आयोग ने उन्हें बंगाल का चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (CEO) बनाया। टीएमसी सरकार की शॉर्टलिस्ट को अस्वीकार कर आयोग ने उन्हें चुना था। उन्होंने SIR का पूरा पर्यवेक्षण किया और 2026 चुनाव कराए। चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहे, हिंसा कम हुई।

चुनाव के ठीक बाद, नई भाजपा सरकार (मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी) ने उन्हें राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया। यह फैसला विवादास्पद है क्योंकि वही अधिकारी जो चुनाव करा रहे थे, अब उसी सरकार के टॉप प्रशासनिक पद पर हैं। टीएमसी इसे “इनाम” बता रही है।⁠

सुब्रत गुप्ता कौन हैं?

सुब्रत गुप्ता रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं। चुनाव आयोग ने उन्हें स्पेशल रोल ऑब्जर्वर के रूप में SIR के लिए बंगाल भेजा था। उन्होंने मतदाता सूची संशोधन की निगरानी की। चुनाव के बाद नई सरकार ने उन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया।

दोनों अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर टीएमसी और कुछ विपक्षी नेता कह रहे हैं कि यह “रिवॉर्ड” है, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर शक होता है।

क्या चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष थे?

तथ्य यह हैं: SIR पूरे देश में हुआ, सिर्फ बंगाल में नहीं। यूपी में भी 2 करोड़ से ज्यादा नाम कटे।

चुनाव आयोग ने दावा किया कि प्रक्रिया पारदर्शी थी, BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) ने घर-घर जाकर वेरिफिकेशन किया, और अपील का मौका दिया गया।

कई नाम वाकई फर्जी या पुराने थे, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा है।

लेकिन आलोचना भी जायज है—27 लाख से ज्यादा अपील लंबित रह गईं, जिससे लाखों असली मतदाता वोट नहीं डाल सके। कुछ मामलों में दस्तावेज जमा करने के बावजूद नाम नहीं जुड़े।

मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग ने हमेशा कहा कि वे निष्पक्ष हैं और किसी दबाव में नहीं आए।

अंत में हम यह कह सकते हैं कि चुनावों में कुछ कमियां जरूर रहीं। मतदाता सूची की सफाई जरूरी थी, लेकिन प्रक्रिया में पारदर्शिता और अपीलों के त्वरित निपटारे की कमी से विश्वसनीयता प्रभावित हुई। फिर भी, चुनाव आयोग की निगरानी में मतदान हुआ, नतीजे आए, और सत्ता हस्तांतरण हुआ। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पूर्ण 100% निष्पक्षता कभी आसान नहीं होती, लेकिन जनता के साथ धोका हुआ जोकि देश के लिए बहुत बुरा है. मौजूदा सरकार को किसी भी सूरत में सही नहीं माना जा सकता है।

विपक्ष को न्यायालय और जनता के माध्यम से जवाबदेही तय करनी चाहिए, न कि सिर्फ आरोप लगाने से। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब संस्थाएं अपनी स्वतंत्रता बनाए रखें और प्रक्रियाएं पारदर्शी हों।

रिपोर्ट : मोहम्मद इस्माइल.

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