दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस और लंबे संघर्ष की अनसुनी कहानी

Share this News

गया जी (बिहार) में दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाया गया, लेकिन इस मौके पर उस लंबे संघर्ष की चर्चा नहीं हुई जिसके बाद यह विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। इसी बात को लेकर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रतिनिधि और प्रवक्ता प्रो. विजय कुमार मिट्ठू समेत कई नेताओं ने नाराज़गी जताई।

प्रो. विजय कुमार मिट्ठू, प्रो. मुद्रिका सिंह नायक, बृज मोहन शर्मा, बाल्मीकि प्रसाद, श्रीकांत शर्मा, रीता देवी, राम कृष्ण त्रिवेदी, विद्या शर्मा, युगल किशोर सिंह और नरेंद्र कुमार ने कहा कि जब केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार थी, तब देश में 16 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने का फैसला लिया गया। उसी के तहत 2009 में पटना के एक किराए के भवन में बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई।

मोतिहारी से गया तक का संघर्ष

नेताओं के अनुसार, 2009 से 2012 तक बिहार सरकार ने कई बार घोषणा की कि केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी में बनेगा, लेकिन तीन साल तक जमीन ही उपलब्ध नहीं हो पाई। इसके बाद गया में “केंद्रीय विश्वविद्यालय निर्माण संघर्ष समिति” का गठन हुआ और 2012 से आंदोलन शुरू हुआ।

संघर्ष समिति ने पटना से लेकर दिल्ली तक आवाज उठाई। तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को ज्ञापन सौंपा गया। इसके बाद टिकारी प्रखंड के दरियापुर-पंचानपुर में रक्षा मंत्रालय की हजारों एकड़ जमीन में से 350 एकड़ जमीन विश्वविद्यालय के लिए दी गई।

2014 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्षा, जो विश्वविद्यालय की कुलाधिपति भी थीं, और उस समय के कुलपति डॉ. जनक पांडेय द्वारा शिलान्यास किया गया। आखिरकार 2017 में दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय का अपना भवन तैयार हुआ और पढ़ाई किराए के भवन से यहां शिफ्ट हो गई।

बिहार को मिले दो केंद्रीय विश्वविद्यालय

नेताओं ने कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने बिहार को एक की जगह दो केंद्रीय विश्वविद्यालय दिए। गया में दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय और मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय। हालांकि उनका कहना है कि मोतिहारी स्थित विश्वविद्यालय को अब तक जरूरत के मुताबिक जमीन नहीं मिली है, इसलिए उसका अपना भवन पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है।

स्थापना दिवस पर संघर्ष का जिक्र नहीं

संघर्ष समिति के नेताओं का कहना है कि जब गया में केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की मांग उठी थी, तब कई राजनीतिक नेताओं ने इसका विरोध किया था। यहां तक कि संघर्ष समिति के लोगों को कहा गया था कि गया में विश्वविद्यालय नहीं खुलेगा।

उन्होंने आरोप लगाया कि स्थापना दिवस के कार्यक्रम में संघर्ष समिति के योगदान का जिक्र तक नहीं किया गया। संघर्ष के दौरान जिन लोगों ने अहम भूमिका निभाई, यहां तक कि जो शहीद हुए — जैसे टिकारी अनुमंडल के संयोजक रामानंद शर्मा और सचिव श्रवण सिंह — उनके बारे में भी बात नहीं हुई।

साथ ही आंदोलन के दौरान घायल हुए प्रो. मुद्रिका सिंह नायक, बृज मोहन शर्मा और श्रीकांत शर्मा जैसे लोगों को भी सम्मान देने की पहल नहीं की गई। नेताओं का कहना है कि आज स्थापना दिवस में वे लोग शामिल हो रहे हैं जिनका विश्वविद्यालय खोलने या संघर्ष में कोई योगदान नहीं था।

पुरानी मांगें अब भी बाकी

संघर्ष समिति का कहना है कि वे अब भी अपनी मांगों को लेकर सक्रिय हैं। उनकी मांग है कि विश्वविद्यालय का नाम बदलकर “विष्णु-बुद्ध केंद्रीय विश्वविद्यालय” किया जाए। साथ ही परिसर में स्थापना के समय घोषित मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज भी खोले जाएं।

उन्होंने यह भी कहा कि संघर्ष के दौरान शहीद हुए लोगों के परिजनों को सम्मान दिया जाए और घायलों को मंच पर बुलाकर प्रतिष्ठा दी जाए। नेताओं के मुताबिक इन पुरानी मांगों पर ध्यान न देना कई सवाल खड़े करता है।

कुल मिलाकर, स्थापना दिवस का समारोह तो हुआ, लेकिन संघर्ष की कहानी और उससे जुड़े लोगों को याद न करना कई लोगों को अखर गया।

रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.

Share this News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *