औरंगाबाद (बिहार) से जुड़ी एक अहम राजनीतिक चर्चा इन दिनों तेज़ है। बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और Suresh Paswan का कहना है कि बिहार की राजनीति में अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। उनके मुताबिक लगभग 35 साल से चल रही मंडल और पिछड़ा वर्ग की राजनीति का एक दौर अब खत्म होता दिखाई दे रहा है।
मंडल राजनीति की शुरुआत और लालू का दौर
डॉ. सुरेश पासवान बताते हैं कि साल 1990 बिहार की राजनीति के लिए एक बड़ा मोड़ था। इसी समय बिहार में कांग्रेस का लंबे समय से चला आ रहा राज खत्म हुआ और Janata Dal की सरकार बनी। उस सरकार के मुखिया बने Lalu Prasad Yadav।
लालू प्रसाद यादव ने अपने शासनकाल में सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सद्भाव को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। उनका दावा था कि समाज के आखिरी पायदान पर खड़े लोगों को भी सत्ता और व्यवस्था में बराबरी का हक मिलना चाहिए।
लालू ने इसी सोच के साथ कई ऐसे फैसले किए, जिनसे गरीब, पिछड़े और हाशिए पर रहने वाले लोगों को राजनीतिक ताकत और पहचान मिली।
डॉ. पासवान के मुताबिक 1990 से 2005 तक चला लालू-राबड़ी का दौर गरीबों के लिए किसी “गोल्डन पीरियड” से कम नहीं था। उस समय सामाजिक न्याय की राजनीति ने बिहार में गहरी जड़ें जमा ली थीं।
2005 में आया नया मोड़
साल 2005 में बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ, जब Nitish Kumar ने Bharatiya Janata Party के साथ मिलकर सरकार बनाई।
नीतीश कुमार ने उस समय “न्याय के साथ विकास” का नारा दिया। उन्होंने भी पिछड़ा वर्ग की राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश की। पंचायत और नगर निकाय चुनावों में एकल पदों पर भी आरक्षण देने जैसे फैसले इसी दौर में हुए।
साथ ही उन्होंने पिछड़ा, अति-पिछड़ा, दलित और महादलित जैसे सामाजिक समीकरणों के जरिए अपना मजबूत वोट बैंक तैयार किया।
सत्ता बचाने की राजनीति
डॉ. पासवान का कहना है कि सत्ता में बने रहने के लिए नीतीश कुमार ने कई बार अपने पुराने विरोधियों से भी हाथ मिला लिया। इसी वजह से राजनीति में कई लोग उन्हें “पलटू राम” या “कुर्सी कुमार” जैसे नामों से भी बुलाने लगे।
फिर भी यह सच है कि नीतीश कुमार करीब दो दशकों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे और इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में उनका नाम शामिल हो गया।
भाजपा के साथ रिश्ते और बदलता समीकरण
डॉ. सुरेश पासवान के मुताबिक, भले ही नीतीश कुमार भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहे थे, लेकिन भाजपा धीरे-धीरे बिहार में अपनी स्थिति मजबूत करने में लगी हुई थी। उनका आरोप है कि भाजपा का लक्ष्य था कि किसी समय वह खुद बिहार में पूरी तरह सत्ता में आ जाए।
उनका कहना है कि आखिरकार राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि नीतीश कुमार कमजोर होते चले गए और भाजपा अपने मिशन में सफल हो गई।
क्या सच में खत्म हुआ नीतीश युग?
डॉ. पासवान का दावा है कि अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि नीतीश कुमार को दिल्ली भेजकर बिहार की राजनीति से लगभग बाहर कर दिया गया है। उनके मुताबिक इससे बिहार में 35 साल से चल रही पिछड़ा वर्ग की राजनीति के एक दौर का अंत माना जा सकता है।
वे यह भी कहते हैं कि भाजपा के साथ पहले भी कई सहयोगी दलों का राजनीतिक असर कम होता गया। उदाहरण के तौर पर वे महाराष्ट्र में Shiv Sena, पंजाब में Shiromani Akali Dal, जम्मू-कश्मीर में Mehbooba Mufti और उत्तर प्रदेश में Mayawati का ज़िक्र करते हैं।
उनका मानना है कि अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहाँ पुराने समीकरण बदलते हुए दिखाई दे सकते हैं।
रिपोर्ट: अजय कुमार पाण्डेय.
