उमगा सूर्य मंदिर में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का हुआ भव्य समापन

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बिहार के मदनपुर प्रखंड मुख्यालय और बाजार से करीब एक किलोमीटर दक्षिण दिशा में स्थित प्रसिद्ध उमगा सूर्य मंदिर परिसर में पिछले एक सप्ताह से चल रही श्रीमद्भागवत कथा का रविवार रात करीब 8:30 बजे श्रद्धा और भक्ति के माहौल में सफलतापूर्वक समापन हो गया।

यह मंदिर अपनी प्राचीन मान्यता और भव्यता के लिए काफी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस पौराणिक मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में किया था। इसी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले मंदिर प्रांगण में सात दिनों तक हर शाम भक्तों की बड़ी संख्या जुटती रही। आसपास के गांवों और इलाकों से सैकड़ों श्रद्धालु रोज़ कथा सुनने पहुंचे, जिससे पूरा मंदिर परिसर पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूबा रहा।

कथा के अंतिम दिन वृन्दावन से आए प्रसिद्ध कथावाचक नीरज भास्कर महाराज ने अपने प्रवचन में भगवान श्री कृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा की मार्मिक कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि जब निर्धन ब्राह्मण सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे, तो भगवान ने उनका किस तरह प्रेम और सम्मान के साथ स्वागत किया।

महाराज जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र से उनके हाल-चाल पूछे और उनके जीवन के कष्टों को हमेशा के लिए दूर कर दिया। जब भगवान की पत्नी रुक्मिणी ने सुदामा के बारे में पूछा, तब श्रीकृष्ण ने बड़े प्रेम से कहा कि सुदामा जैसा सच्चा मित्र और त्यागी इंसान बनना किसी के लिए आसान नहीं है।

उन्होंने बताया कि सुदामा के पास देने के लिए सिर्फ तसली में बंधे हुए चार मुट्ठी चावल थे, जो वे अपने मित्र के लिए लाए थे। वहीं भगवान श्रीकृष्ण तो तीनों लोकों के स्वामी हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि यदि वे तीनों लोक भी दे दें, तब भी अपने मित्र सुदामा के प्रेम और सच्चाई की बराबरी नहीं कर सकते।

अपने प्रवचन के दौरान नीरज भास्कर महाराज ने यह भी बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने राजा परीक्षित को भी किस तरह मोक्ष प्रदान किया।

कथा के दौरान उन्होंने जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संदेश भी दिया। उन्होंने समझाया कि इस प्रकृति और ब्रह्मांड का नियम बिल्कुल प्रतिध्वनि (Echo) की तरह है। जैसे माइक्रोफोन से बोली गई आवाज़ कई बार लौटकर वापस सुनाई देती है, वैसे ही इंसान के कर्म भी कई गुना होकर उसी के पास लौटते हैं।

उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी को अपशब्द या गाली देता है, तो वह शब्द कहीं खत्म नहीं होते। वे ब्रह्मांड में गूंजते रहते हैं और समय आने पर कई गुना होकर वापस उसी व्यक्ति के पास लौटते हैं। उसी तरह यदि कोई किसी का सम्मान करता है, स्वागत करता है या अच्छे काम करता है, तो प्रकृति भी उसे कई गुना सम्मान और सुख लौटाती है।

महाराज जी ने कहा कि जो व्यक्ति किसी का अपमान करता है, वह अपने लिए अपमान ही जमा करता है। वहीं जो दूसरों को सम्मान देता है, उसे भी जीवन में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इंसान जो भी इस प्रकृति में देता है—चाहे अच्छा हो या बुरा—वह कई गुना बढ़कर एक दिन उसके पास जरूर लौटकर आता है।

इस प्रकार उमगा सूर्य मंदिर में आयोजित यह सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र बनी, बल्कि लोगों को जीवन के गहरे आध्यात्मिक और नैतिक संदेश भी देकर गई।

रिपोर्ट: अजय कुमार पांडेय.

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