नई दिल्ली में BRICS बैठक ने दुनिया को क्या संदेश दिया?
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक 2026 केवल एक सामान्य कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं थी। इस बैठक ने दुनिया को यह संकेत दिया कि अब वैश्विक व्यवस्था धीरे-धीरे बदल रही है। जिन देशों को लंबे समय तक विकासशील या उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं कहा जाता था, वे अब केवल सुधार की मांग नहीं कर रहे, बल्कि अपनी अलग वैश्विक ताकत और संस्थागत ढांचा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
करीब बीस साल पहले शुरू हुआ ब्रिक्स समूह अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। शुरुआत में यह केवल आर्थिक सहयोग का मंच माना जाता था, लेकिन अब यह वैश्विक राजनीति, आर्थिक संतुलन और रणनीतिक साझेदारी का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। नई दिल्ली में हुई बैठक से यह साफ दिखाई दिया कि ब्रिक्स देश अब केवल पश्चिमी देशों के प्रभुत्व पर सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि उसके विकल्प भी तैयार करना चाहते हैं।
BRICS का बदलता स्वरूप
ब्रिक्स की स्थापना वर्ष 2006 में हुई थी। उस समय दुनिया की आर्थिक व्यवस्था पर पश्चिमी देशों का प्रभाव बहुत अधिक था। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। वैश्विक व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, वित्त और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर नई चुनौतियां सामने आ चुकी हैं।
आज दुनिया कई हिस्सों में बंटती दिखाई दे रही है। आपूर्ति श्रृंखलाएं अब केवल व्यापार का विषय नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ चुकी हैं। तकनीक भी अब केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार बन चुकी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुगतान, सेमीकंडक्टर और साइबर तकनीक जैसे क्षेत्र अब देशों की ताकत तय कर रहे हैं। ऐसे समय में ब्रिक्स खुद को एक वैकल्पिक वैश्विक मंच के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
एस. जयशंकर का बड़ा संदेश
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बैठक के दौरान कहा कि अब ब्रिक्स को केवल चर्चा का मंच बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे ठोस परिणाम देने वाला संगठन बनना होगा। उनका यह बयान केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी। इसके पीछे यह स्पष्ट संदेश था कि अब ब्रिक्स देशों को नई आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था, विकास संस्थानों और वैश्विक सहयोग के नए मॉडल तैयार करने होंगे।
जयशंकर ने अपने भाषण में “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता” जैसे शब्दों पर विशेष जोर दिया। लेकिन इन शब्दों का अर्थ केवल विकास योजनाएं नहीं हैं।
आज “लचीलापन” का मतलब है कि देश ऐसी व्यवस्थाएं बनाएं जिन पर बाहरी शक्तियों का दबाव कम हो। “नवाचार” अब केवल विज्ञान या तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक क्षमता से जुड़ चुका है। वहीं “सहयोग” का अर्थ है कि विकासशील देश आपस में मिलकर पश्चिमी ढांचे से अलग आर्थिक और तकनीकी नेटवर्क तैयार करें।
भारत की संतुलित रणनीति
नई दिल्ली में भारत की भूमिका बेहद संतुलित दिखाई दी। भारत एक तरफ खुद को वैश्विक दक्षिण और विकसित देशों के बीच पुल के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ वह ब्रिक्स को पूरी तरह पश्चिम विरोधी मंच बनने से भी बचाना चाहता है।
भारत की कोशिश है कि ब्रिक्स एक व्यावहारिक और विकास केंद्रित संगठन बना रहे। हालांकि इसके पीछे भारत की अपनी रणनीतिक सोच भी साफ दिखाई देती है।
भारत समझता है कि आने वाले समय में दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ेगी। ऐसे में किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय कई साझेदारियों के साथ आगे बढ़ना अधिक सुरक्षित और लाभकारी होगा।
ईरान ने पश्चिमी व्यवस्था पर उठाए सवाल
बैठक के दौरान ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सबसे तीखी टिप्पणी की। उन्होंने पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को खत्म करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के राजनीतिक इस्तेमाल को रोकने की बात कही।
ईरान लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव का सामना करता रहा है। इसलिए उसके लिए ब्रिक्स केवल आर्थिक मंच नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने का एक अवसर भी है।
ईरान की यह सोच केवल उसी तक सीमित नहीं है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देशों में यह भावना बढ़ रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अभी भी पश्चिमी देशों के प्रभाव में काम करती हैं और निर्णय लेने में विकासशील देशों की भागीदारी कम है।
चीन और रूस की रणनीति
हालांकि चीन के विदेश मंत्री वांग यी इस बैठक में शामिल नहीं हुए, लेकिन चीन ने ब्रिक्स के प्रति अपना समर्थन दोहराया। चीन लंबे समय से ब्रिक्स के विस्तार और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ मजबूत संबंध बनाने का समर्थक रहा है।
चीन के लिए ब्रिक्स एक ऐसा मंच है, जिसके जरिए वह एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को मजबूत कर सकता है। वहीं रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कहा कि अब दुनिया की शासन व्यवस्था बीसवीं सदी के अनुसार नहीं चल सकती। उन्होंने राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत बताई।
पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस के लिए ब्रिक्स का महत्व और बढ़ गया है। रूस अब बहुध्रुवीय दुनिया को अपनी रणनीतिक आवश्यकता मानता है।
BRICS के भीतर मौजूद चुनौतियां
हालांकि ब्रिक्स तेजी से मजबूत होता दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके भीतर कई मतभेद भी मौजूद हैं। भारत और चीन के बीच एशिया में प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा है। ब्राजील का ध्यान मुख्य रूप से विकास और जलवायु नीति पर है। दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी देशों के विकास और प्रतिनिधित्व पर जोर देता है। वहीं खाड़ी और मध्य पूर्व के नए सदस्य देशों की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं।
यही विविधता ब्रिक्स की ताकत भी है और चुनौती भी।
यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है जहां सभी देशों की विचारधारा एक जैसी हो। बल्कि यह अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्था, संस्कृति और आर्थिक मॉडल वाले देशों का समूह है, जो एक समान वैश्विक प्रतिनिधित्व चाहते हैं।
नई संस्थाओं के निर्माण पर जोर
नई दिल्ली बैठक में न्यू डेवलपमेंट बैंक और कंटिजेंट रिजर्व अरेंजमेंट जैसे संस्थानों पर विशेष चर्चा हुई। यह दिखाता है कि ब्रिक्स अब केवल आलोचना नहीं करना चाहता, बल्कि नई व्यवस्थाएं भी बनाना चाहता है।
यदि ब्रिक्स देश व्यापार, तकनीक, वित्त और आधारभूत ढांचे में मजबूत सहयोग स्थापित करने में सफल होते हैं, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति संतुलन काफी बदल सकता है। लेकिन यदि यह समूह केवल घोषणाओं तक सीमित रह गया, तो इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं।
बदलती दुनिया में BRICS की भूमिका
नई दिल्ली में हुई बैठक से एक बात साफ हो गई कि अब बहुध्रुवीय दुनिया की मांग केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं है। यह आर्थिक सुरक्षा, तकनीकी स्वतंत्रता, ऊर्जा व्यवस्था और विकास से सीधे जुड़ चुकी है।
ब्रिक्स अब केवल एक संगठन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है। आने वाले समय में यह समूह दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा प्रभाव डालेगा, यह भविष्य तय करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वैश्विक शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है और वैश्विक दक्षिण के देश अब दुनिया के फैसलों में कहीं बड़ी भूमिका निभाना चाहते हैं।
रिपोर्ट : मोहम्मद इस्माइल.
