औरंगाबाद: औरंगाबाद (बिहार) के चेई गांव में चैत्र नवरात्र के मुबारक मौके पर शुरू हुई प्रभु श्री राम कथा अपने आख़िरी दिन एक खास रूहानी माहौल में खत्म हुई। प्रतिपदा से लेकर रामनवमी तक लगातार चली इस कथा ने गांव के लोगों को भक्ति और भावना से भर दिया। आख़िरी दिन वृन्दावन से तशरीफ़ लाए मशहूर कथावाचक पूज्य नीरज भास्कर महाराज जी ने मंच से ऐसा बयान किया कि श्रोता पूरी तरह भाव-विभोर हो गए।
महाराज जी ने बड़ी सादगी और आसान लफ़्ज़ों में बताया कि प्रभु श्री राम की कथा किसी पवित्र गंगा में डुबकी लगाने जैसी है। उन्होंने आगे रामायण का वो प्रसंग सुनाया, जब प्रभु श्री राम माता सीता की तलाश में निकलते हैं और उनकी मुलाकात सुग्रीव जी से होती है। जटायु पहले ही कुछ इशारे दे चुके थे, जिससे ये बात और पक्की हो जाती है।
फिर उन्होंने बाली और सुग्रीव की कहानी को बड़ी गहराई से समझाया। बाली का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि वो बहुत शक्तिशाली था लेकिन अहंकार में आकर अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी पर बुरी नज़र रखता था। यही अधर्म उसकी मौत का कारण बना। जब बाली और सुग्रीव के बीच युद्ध हुआ, तो प्रभु श्री राम ने बाली को बाण मारकर उसका अंत किया।

इस दौरान एक दिलचस्प बात भी सामने आई—जब प्रभु श्री राम ने पहली बार बाली पर बाण चलाया, तो सुग्रीव को शक हुआ कि कहीं प्रभु भी बाली से मिले हुए तो नहीं हैं। तब प्रभु श्री राम ने समझाया कि दोनों भाई एक जैसे दिखते हैं, इसलिए पहचानना मुश्किल था। बाद में उन्होंने सुग्रीव को आशीर्वाद दिया और उसके दुख दूर किए, फिर दुबारा युद्ध हुआ और बाली का अंत हुआ।
महाराज जी ने इस प्रसंग के ज़रिए एक अहम पैग़ाम दिया कि रिश्तों की मर्यादा बहुत जरूरी होती है। उन्होंने बताया कि हमारे शास्त्रों में 16 ऐसे रिश्ते बताए गए हैं जिन्हें मां के समान माना गया है, और इन रिश्तों की इज्ज़त करना हर इंसान का फर्ज़ है।
कथा के दौरान उन्होंने एक और मिसाल दी—राजा चित्रकेतु की, जिनके बेटे की कम उम्र में मौत हो गई थी। जब नारद जी उन्हें स्वर्ग ले जाकर बेटे से मिलवाते हैं, तो बेटा कहता है कि “आप मेरे सिर्फ एक जन्म के पिता हैं, ऐसे तो मेरे कई जन्मों में कई पिता रहे हैं।” इस कहानी से उन्होंने समझाया कि आत्मा की यात्रा बहुत लंबी होती है, शरीर बदलता रहता है।
महाराज जी ने आगे बताया कि जैसे पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है, और जैसे छोटी-छोटी नदियां गंगा में मिलकर गंगाजल बन जाती हैं, वैसे ही भगवान की कृपा इंसान को बदल देती है।
उन्होंने ये भी बताया कि रावण के मारे जाने के बाद विभीषण ने मंदोदरी से विवाह किया और सुग्रीव ने भी तारा से विवाह किया—ये सब धर्म और समय के अनुसार हुआ।
कथा के अंत में महाराज जी ने कुछ ज़िंदगी से हुईजुड़े जरूरी सबक भी दिए। उन्होंने कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, किसी से बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए। और कभी भी किसी दूत (संदेशवाहक) को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, क्योंकि वो सिर्फ संदेश लेकर आता है।
हनुमान जी का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि कैसे रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवाई, और फिर हनुमान जी ने उसी आग से पूरी लंका जला दी। बाद में उन्होंने माता सीता को प्रभु श्री राम की अंगूठी देकर उनका हाल जाना।
आख़िर में महाराज जी ने बड़ी सादगी से कहा कि भगवान हर काम हर किसी से नहीं करवाते, बल्कि सही समय पर सही इंसान को चुनते हैं। उन्होंने चेई गांव के लोगों और स्थानीय मुखिया विकास कुमार सिंह उर्फ बबलू सिंह का भी शुक्रिया अदा किया, जिनके सहयोग से ये कथा सफल हो सकी।
उन्होंने ये भी बताया कि वृन्दावन में हजारों ऐसे कथावाचक हैं जिन्हें आज तक मंच नहीं मिला,
इसलिए इंसान को कभी अपनी ताकत और काबिलियत का घमंड नहीं करना चाहिए।
कथा के समापन पर पूरा माहौल भक्ति, भाव और संतोष से भर गया।
रिपोर्ट: अजय कुमार पाण्डेय.
