मुंबई की हलचल भरी शाम में एक बड़ा संदेश निकलकर आया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने जेन-जी और जेन-अल्फा के करीब दो हजार युवाओं से सीधा मुलाकात की। नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित इस कार्यक्रम में देश भर के सौ से ज्यादा शहरों से आए किशोर-किशोरियाँ मौजूद थे। उम्र पंद्रह से उन्नीस साल के बीच। कार्यक्रम भारत अंतरराष्ट्रीय आंदोलन एकजुट राष्ट्र (आईआईएमयूएन) की पंद्रहवीं वर्षगांठ का हिस्सा था।
भागवत जी ने साफ कहा – अगर जेन-जी विरोध कर रही है तो वे राष्ट्र-विरोधी नहीं हैं। वे हमारे ही लोग हैं, हमारी ही अगली पीढ़ी हैं। यह बात उन्होंने हाल के छात्र प्रदर्शनों के संदर्भ में कही, जहाँ शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा संबंधी मुद्दों पर युवा सड़क पर उतरे थे।
युवाओं की शिकायतें जायज, संवाद ही रास्ता
भागवत जी ने जोर देकर बताया कि नई पीढ़ी सवाल पूछती है। पुरानी पीढ़ी बड़े लोगों की बात बिना सवाल मान लेती थी, लेकिन आज के युवा तार्किक जवाब चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जेन-जी और जेन-अल्फा मौजूदा पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार हैं। देशभक्ति और सेवा की सच्ची भावना उनमें गहराई से बसती है। अगर उन्हें आँख बंद करके किसी पर भरोसा करना हो तो वे जेन-जी पर ही करेंगे।
विरोध प्रदर्शन को उन्होंने लोकतंत्र का हिस्सा बताया। शांतिपूर्ण विरोध भी बातचीत का एक रूप है। जब बात नहीं सुनी जाती तो लोग आवाज उठाते हैं। लेकिन मकसद बँटवारा नहीं, सहमति बनाना होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में अभी बहुत सुधार की जरूरत है। युवाओं की शिकायतें बिना वजह नहीं हैं। समय रहते बात हो जाती तो आंदोलन इतना नहीं बढ़ता।
मुंबई के कार्यक्रम में क्या-क्या हुआ
कार्यक्रम का विषय था – दुनिया को एकजुट करने में युवाओं की भूमिका, भारतीय तरीका। भागवत जी मुख्य वक्ता थे। आयोजकों ने बताया कि यह संवाद इसलिए जरूरी था ताकि नई पीढ़ी के विचार सुने जाएँ और उनका नजरिया समझा जाए। दो हजार से ज्यादा छात्र-छात्राएँ वहाँ बैठे थे। कुछ सवाल पूछे, कुछ चुपचाप सुने। माहौल खुला और सीधा था।
भागवत जी ने कहा कि बड़ों को सिर्फ आदेश देने की बजाय अपनेपन और तर्क के साथ बात करनी चाहिए। युवा अलग लोग नहीं हैं। वे देश का भविष्य हैं। उनकी बात सुनना, समझना और जवाब देना जरूरी है। उन्होंने शिक्षा में सार्वजनिक भागीदारी, शिक्षकों के प्रशिक्षण और गुणवत्ता पर जोर दिया। शिक्षा व्यापार नहीं, लोगों को शिक्षित करने का काम है।
नई पीढ़ी पर भरोसा क्यों जरूरी
आज के युवा सोशल मीडिया के दौर में बड़े हो रहे हैं। वे हर बात पर सवाल करते हैं। भागवत जी ने स्वीकार किया कि हाल की घटनाओं की पूरी जानकारी उनके पास नहीं, लेकिन फिर भी युवाओं पर उनका भरोसा अटल है। उन्होंने कहा कि विरोध किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था सुधार के लिए होना चाहिए।
यह संदेश इसलिए खास है क्योंकि पिछले कुछ समय में युवा प्रदर्शनों को लेकर तीखी बहस चली। कुछ लोग उन्हें गलत बता रहे थे। भागवत जी का यह बयान उस बहस को शांत करने और संवाद की तरफ ले जाने वाला है। उन्होंने साफ कर दिया कि नई पीढ़ी को दूर धकेलने की बजाय करीब लाना चाहिए।
युवा शक्ति और देश का भविष्य
देश की आबादी में युवा बड़ी तादाद में हैं। अगर उनकी ऊर्जा सही दिशा में लगे तो विकास तेज होगा। भागवत जी ने याद दिलाया कि संवाद से ही समाधान निकलता है। विरोध हो तो भी उसे विभाजन का कारण न बनाएँ। सहमति बनाएँ। जेन-जी और जेन-अल्फा में देशभक्ति की अपील असर करती है। उन्हें ईमानदारी से राष्ट्र सेवा की तरफ प्रेरित किया जा सकता है।
मुंबई का यह कार्यक्रम सिर्फ एक भाषण नहीं था। यह दो पीढ़ियों के बीच पुल बनाने की कोशिश थी। युवाओं ने अपनी बात रखी, भागवत जी ने सुनी और जवाब दिया। अंत में संदेश साफ था – विरोध करने वाले भी अपने हैं। अगली पीढ़ी को राष्ट्र-विरोधी कहना गलत है। उन्हें समझो, उनसे बात करो, उनके सवालों के जवाब दो। तभी देश आगे बढ़ेगा।
यह बातचीत याद रखने लायक है। क्योंकि भविष्य इन्हीं युवाओं के हाथ में है। और जब बड़े लोग उनकी बात सुनते हैं तो विश्वास बढ़ता है। मोहन भागवत का यह संदेश उसी विश्वास को मजबूत करने वाला है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
