औरंगाबाद (बिहार) : बिहार के औरंगाबाद जिले के दाउदनगर अनुमंडल के हिक्षण बिगहा गांव की रहने वाली फाइटर महिला नेत्री उषा शरण ने अब जनसुराज पार्टी का दामन थाम लिया है। पार्टी ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देते हुए महिला प्रकोष्ठ का प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया है।
उषा शरण पहले भी कई बार चुनाव लड़ चुकी हैं। उन्होंने साल 1990 में आई.पी.एफ. पार्टी के बैनर तले औरंगाबाद विधानसभा से चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2015 में शोषित समाज दल से रफीगंज विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरीं। वहीं 2014 में औरंगाबाद लोकसभा और 2019 में काराकाट लोकसभा सीट से भी उन्होंने चुनाव लड़ा।
जब उनसे पूछा गया कि इतने अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ने के बाद आखिर उन्होंने जनसुराज पार्टी ही क्यों चुनी, तो उन्होंने कहा कि उनके लिए चुनाव लड़ना ही मकसद नहीं रहा। उनका कहना था कि जहां भी रहीं, वैचारिक लड़ाई की कमी महसूस हुई। उन्होंने कहा कि सत्ता बदलती रही, लेकिन व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं आया।
उषा शरण ने बताया कि जनसुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर के विचार और उनका अभियान उन्हें काफी प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि “हमें सत्ता नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने के लिए सत्ता चाहिए” — यही सोच उन्हें इस पार्टी तक लाई है। उन्होंने पलायन रोकने, बेरोजगारी खत्म करने और महिलाओं के मुद्दों पर काम करने के एजेंडे को भी अहम बताया।
जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें भरोसा है कि ये वादे पूरे होंगे, तो उन्होंने साफ कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है। उनका कहना था कि जब तक किसी को मौका नहीं दिया जाएगा, तब तक पहले से ही उस पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। अगर कोई भटकता है तो जनता उसे माफ नहीं करती।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जनसुराज पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलने के सवाल पर उन्होंने कहा कि सीट जीतना ही असली जीत नहीं होती। उनका मानना है कि वैचारिक स्तर पर लड़ाई जीतना ज्यादा अहम है। उन्होंने दावा किया कि उनके आंदोलन के दबाव की वजह से ही सरकार को कुछ फैसले लेने पड़े।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान महिलाओं को पैसे देकर प्रभावित किया गया और पेंशन राशि बढ़ाई गई। उन्होंने कहा कि ये सब उनके संघर्ष का ही असर है, लेकिन उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उनका कहना था कि 10,000 रुपये देकर महिलाओं को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता।
मौजूदा बिहार सरकार पर उन्होंने कड़ा हमला बोलते हुए इसे जनता के साथ छलावा बताया। उन्होंने कहा कि वोट जिस नाम पर लिया गया, काम उस हिसाब से नहीं हुआ। उन्होंने भ्रष्टाचार बढ़ने और व्यवस्था के बिगड़ने की भी बात कही।
इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में बैठे कुछ लोगों पर गंभीर आरोप हैं और ऐसे लोगों के हाथ में राज्य की बागडोर देना सही नहीं है। उन्होंने कहा कि इससे बिहार की हालत और खराब होगी।
जातीय राजनीति के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि बिहार में लंबे समय से जाति के आधार पर राजनीति हो रही है, लेकिन अब इसका अंत भी करीब है। उन्होंने कहा कि लोग अब समझदार हो रहे हैं और सिर्फ जाति के नाम पर वोट नहीं देंगे।
उन्होंने आगे कहा कि कई नेता अपने समाज का नाम लेकर राजनीति करते हैं, लेकिन जब टिकट देने की बारी आती है तो अपने परिवार को आगे कर देते हैं। इससे लोकतंत्र कमजोर होता है।
अंत में उन्होंने कहा कि बिहार में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, जिसे बदलने के लिए उनकी लड़ाई जारी रहेगी।
रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.
