आज के दौर में जब मज़हब के नाम पर नफ़रत फैलाना आसान हो गया है, ऐसे वक़्त में कुछ लोग अपने अमल से साबित कर देते हैं कि इंसानियत ही सबसे बड़ा मज़हब है। नाज़िम भाई उन्हीं लोगों में से एक हैं, जिन्होंने अब तक 300 से ज़्यादा लोगों की जान बचाकर यह दिखा दिया कि इंसानियत की ख़िदमत किसी ओहदे, ताक़त या इख़्तियार की मोहताज नहीं होती, बल्कि ज़िंदा ज़मीर और दर्दमंद दिल की मोहताज होती है।
इन 300 लोगों की जान बचाकर उन्होंने सिर्फ़ 300 ज़िंदगियाँ ही नहीं बचाईं, बल्कि सैकड़ों माँओं की दुआएँ, बाप की उम्मीदें, बीवियों का सुहाग, बच्चों का मुस्तक़बिल और हज़ारों परिवारों की खुशियाँ भी महफ़ूज़ कर दीं।
जो लोग हर मुसलमान को शक की नज़र से देखते हैं, उन्हें एक बार नाज़िम भाई को ज़रूर देखना चाहिए। वह कभी यह नहीं पूछते कि सामने वाले का मज़हब क्या है। उनके लिए सिर्फ़ इतना काफ़ी होता है कि एक इंसान मुसीबत में है और उसे बचाना है।
गेटवे ऑफ इंडिया के क़रीब पाव बेचकर अपने परिवार का रोज़गार चलाने वाले नाज़िम भाई इंसानियत की ज़िंदा मिसाल हैं। सरकार ने उन्हें न कोई ओहदा दिया, न कोई ज़िम्मेदारी सौंपी और न ही किसी तरह का कोई मुआवज़ा तय किया। लेकिन जब भी समुद्र में किसी इंसान के डूबने की ख़बर मिलती है या कोई डूबता हुआ दिखाई देता है, वह अपनी जान की परवाह किए बिना फ़ौरन समुद्र में कूद पड़ते हैं।
एक हाथ में पाव की टोकरी और दूसरे हाथ से 300 से ज़्यादा डूबते हुए लोगों को नई ज़िंदगी देने वाले नाज़िम भाई का यह जज़्बा हर किसी के लिए मिसाल है।
यही इस्लाम की असली तालीम भी है कि एक बेगुनाह इंसान की जान बचाना पूरी इंसानियत की जान बचाने के बराबर है।
ऐसे बे-लोस और इंसान-दोस्त लोग हमारे समाज का फ़ख्र हैं। सरकार और समाज, दोनों की ज़िम्मेदारी है कि ऐसे लोगों की क़द्र करें, क्योंकि क़ौमें नफ़रत फैलाने वालों से नहीं, बल्कि इंसानियत बचाने वालों से पहचानी जाती हैं।
नाज़िम भाई, आपके जज़्बा-ए-ख़िदमत, बेमिसाल बहादुरी और इंसान-दोस्ती को दिल की गहराइयों से सलाम। दुआ है कि अल्लाह तआला आपको अच्छी सेहत, सलामती, लंबी उम्र और आगे भी ज़्यादा से ज़्यादा इंसानों की ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
रिपोर्ट : शकील अहमद, हाजी अब्दुल हमीद बाग़बान
स्थान: जलगांव
