दिल्ली के पटपड़गंज से भाजपा विधायक Ravinder Singh Negi एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार मामला दिल्ली सरकार की अटल कैंटीन योजना के कार्यक्रम से जुड़ा है, जहाँ ₹5 में भरपेट भोजन देने की योजना का प्रचार किया जा रहा था।
कार्यक्रम के दौरान विधायक ने एक मुस्लिम व्यक्ति को “मुल्ला जी” कहकर बुलाया और उसे ₹5 में खाना खाने के लिए कहा। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में वह कहते सुनाई दे रहे हैं, “अरे, मुल्ला जी… इधर आओ, पांच रुपये में भोजन, मोदी जी अच्छा काम कर रहे हैं।”
इसके साथ उन्होंने वीडियो शेयर करते हुए ऐसा कैप्शन भी लिखा, जिसमें कहा गया कि “वो समुदाय जो भाजपा को वोट नहीं देता, भाजपा की योजनाओं का लाभ उठा रहा है।” बस इसी बात को लेकर सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई।
यह पूरा मामला 9 मई 2026 का बताया जा रहा है और वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। विपक्षी दलों और कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे सांप्रदायिक रंग देने और गरीब व्यक्ति का मजाक उड़ाने जैसा बताया है। वहीं कुछ लोग इसे सिर्फ सरकारी योजना के प्रचार का हिस्सा मान रहे हैं।
दरअसल, अटल कैंटीन योजना गरीब और जरूरतमंद लोगों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है। इस योजना की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की जयंती पर की गई थी। योजना का मकसद यह है कि कम पैसों में कोई भी भूखा न रहे, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से हो।
“मुल्ला” शब्द आमतौर पर इस्लामी विद्वान या मौलवी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि रोजमर्रा की भाषा में कई लोग इसे मुस्लिम व्यक्ति के लिए अनौपचारिक तौर पर भी बोल देते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंच या राजनीतिक माहौल में यही शब्द कई लोगों को अपमानजनक या तिरस्कारपूर्ण लग सकता है। यही वजह है कि इस वीडियो पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।
लोगों का कहना है कि अगर किसी गरीब व्यक्ति को कैमरे के सामने उसके धर्म के आधार पर अलग तरीके से दिखाया जाए और फिर यह कहा जाए कि “वोट नहीं दिया फिर भी योजना का लाभ ले रहे हो”, तो इससे राजनीतिक संदेश ज्यादा दिखाई देता है। ऐसे मामलों में नेताओं को शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।
कई लोगों का मानना है कि योजनाएँ जनता के लिए होती हैं, वोट के बदले में नहीं। भूख और गरीबी जैसे मुद्दों पर राजनीति से ज्यादा इंसानियत और संवेदनशीलता की जरूरत है। अगर सरकार गरीबों को ₹5 में खाना दे रही है, तो उसका फायदा हर नागरिक को मिलना चाहिए, बिना धर्म और वोट बैंक की चर्चा के।
आज के दौर में छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स भी बड़ी राजनीतिक बहस बन जाते हैं। लेकिन असली मुद्दा यह होना चाहिए कि गरीब आदमी को सम्मान के साथ भोजन मिले। नेता हो या आम नागरिक, सार्वजनिक भाषा और व्यवहार में संतुलन और सम्मान बनाए रखना जरूरी है।
गरीबी, भूख और महंगाई जैसे मुद्दे किसी धर्म को देखकर नहीं आते। इसलिए विकास और कल्याणकारी योजनाओं को सांप्रदायिक नजरिए से देखने के बजाय इंसानी जरूरतों के नजरिए से देखना ज्यादा जरूरी है।
-ITN Desk.
