दोस्तों, भारतीय राजनीति का इतिहास हमेशा से विवादों और पुरानी कहानियों से भरा रहा है। आजकल सोशल मीडिया पर एक सवाल बहुत घूम रहा है – आखिर जनसंघ और भाजपा मोहम्मद अली जिन्ना के परिवार से पैसा लेकर पार्टी क्यों चलाती थी? और उनके पुरखों ने जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ सरकार क्यों बनाई? ये सवाल राजनीतिक हमलों का हिस्सा लगते हैं, लेकिन इतिहास को सही से समझना जरूरी है। बिना किसी बात को बढ़ा-चढ़ाए या छुपाए, चलिए तथ्यों के आधार पर देखते हैं।
Nusli Wadia और जनसंघ-भाजपा को फंडिंग
मोहम्मद अली जिन्ना की इकलौती बेटी दीना वाडिया ने इस्लाम छोड़कर पारसी व्यवसायी नेविल वाडिया से शादी की थी। उनका बेटा नुसली वाडिया (जन्म 1944) बॉम्बे डाइंग कंपनी (अब Wadia Group) चलाते हैं।
नुसली वाडिया ने 1960 के अंत और 1970 के दशक से जनसंघ (Bharatiya Jana Sangh) को आर्थिक सहयोग दिया। यह सहयोग इमरजेंसी के समय (1975-77) और उसके बाद भी जारी रहा। किताब Jugalbandi: The BJP Before Modi (विनय सीतापति) में इसका जिक्र है कि नुसली वाडिया उन दिनों जनसंघ के नेताओं जैसे नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी का समर्थन करते थे।
क्यों दिया समर्थन?
नुसली वाडिया खुद को मुख्य रूप से पारसी उद्योगपति मानते थे, न कि पाकिस्तानी विरासत से जुड़ा।
वे कांग्रेस विरोधी थे, खासकर इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ।
टेक्सटाइल उद्योग में प्रतिस्पर्धा भी एक वजह रही।
जब जनसंघ कमजोर था, तब यह फंडिंग महत्वपूर्ण थी। बाद में 1990 के दशक में जब भाजपा मजबूत हुई, तो बड़े कॉर्पोरेट्स का समर्थन बढ़ा।
ये तथ्य हाल ही में AAP जैसे विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए, लेकिन ये कोई नई बात नहीं। नुसली वाडिया का समर्थन 2004 तक माना जाता है। ध्यान दें कि नुसली जिन्ना के पाकिस्तानी राजनीतिक विचारों के उत्तराधिकारी नहीं थे – उनकी मां दीना ने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था।
मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन: हिंदू महासभा का इतिहास
अब दूसरे सवाल की बात – जनसंघ के पुरखों ने मुस्लिम लीग के साथ सरकार क्यों बनाई?
जनसंघ 1951 में बना, श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा, RSS के सहयोग से। इससे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा से जुड़े थे।
1937 के प्रांतीय चुनावों और 1940 के दशक में हिंदू महासभा (वीर सावरकर के नेतृत्व में) ने कुछ प्रांतों में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया:
सिंध और नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (NWFP) में।
बंगाल में गठबंधन का दावा विवादित है – कई इतिहासकार कहते हैं कि बंगाल में श्यामा प्रसाद की सरकार मुस्लिम लीग के साथ नहीं थी।
ये गठबंधन ब्रिटिश भारत के प्रांतीय राजनीति का हिस्सा थे, जहां सत्ता संभालने के लिए समझौते होते थे। हिंदू महासभा ने क्विट इंडिया आंदोलन का विरोध भी किया था, जबकि कांग्रेस जेल गई। ये 1940 के दशक की बात है, जब पाकिस्तान की मांग तेज हो रही थी।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी बाद में कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे, फिर 1950 में इस्तीफा देकर जनसंघ बनाया। जनसंघ ने हमेशा अखंड भारत और हिंदू राष्ट्रवादी विचारों पर जोर दिया।
निष्कर्ष
राजनीति में गठबंधन और फंडिंग आम हैं। विरोधी दल आज इन्हें उठाकर भाजपा पर हमला करते हैं, लेकिन ये घटनाएं अलग-अलग समय और संदर्भ की हैं। जनसंघ-भाजपा का मुख्य विचार हमेशा विवादास्पद और मुस्लिम विरोधी ही रहा है, जबकि फंडिंग उद्योगपतियों से आई – चाहे वो नुसली वाडिया हों या बाद के अन्य।
इतिहास को चुनिंदा तथ्यों से तोड़-मरोड़ना आसान है, लेकिन पूरा सच समझना जरूरी है। क्या आपको लगता है कि पुरानी गठबंधनों का आज के राजनीतिक स्टैंड पर असर पड़ना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
