दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में 18 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया। कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ और पत्रकार-शोधकर्ता इरफान मेहराज को NIA के उस मामले में जमानत मिल गई, जिसे एजेंसी ने “NGO terror funding” का नाम दिया था। प्रिंसिपल एंड सेशंस जज पितंबर दत्त ने यह आदेश दिया। दोनों को कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद रिहा किया जाएगा।
यह खबर कश्मीर के उन तमाम लोगों के लिए राहत की सांस है, जो सालों से इन दोनों के परिवारों की चिंता में घुल रहे थे। खुर्रम परवेज़, जो जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी (JKCCS) के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर हैं, और इरफान मेहराज, जो इसी संगठन से जुड़े पत्रकार-शोधकर्ता रहे, लंबे समय से जेल की सलाखों के पीछे थे।
खुर्रम परवेज़: संघर्ष की कहानी
खुर्रम परवेज़ 49 साल के हैं। 2004 में लैंडमाइन ब्लास्ट में एक पैर गंवाने के बावजूद उन्होंने मानवाधिकारों की आवाज़ बुलंद रखी। JKCCS के जरिए उन्होंने कश्मीर में कथित जबरन गुमशुदगी, हिरासत में यातना, टॉर्चर और एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स जैसी घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया।
NIA ने नवंबर 2021 में उन्हें गिरफ्तार किया। आरोप था कि JKCCS ने विदेशी फंडिंग हासिल की और उसे हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे प्रतिबंधित संगठनों को पहुंचाया। एक दूसरे मामले में लश्कर-ए-तैयबा से सांठ-गांठ का भी इल्जाम लगाया गया। परवेज़ और उनके वकीलों ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि काम सिर्फ मानवाधिकार उल्लंघनों का रिकॉर्ड रखना था।
जून 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अलग NIA मामले में उन्हें जमानत दे दी थी। कोर्ट ने लंबी कैद, ट्रायल की धीमी रफ्तार और उनकी विकलांगता को ध्यान में रखा। पासपोर्ट सरेंडर करने, दिल्ली छोड़ने की मनाही और केस पर पब्लिक स्टेटमेंट न करने जैसे शर्तें लगाई गईं।
इरफान मेहराज: पत्रकारिता और सवाल
इरफान मेहराज मार्च 2023 में गिरफ्तार हुए। वे JKCCS के साथ काम करते थे और वांडे मैगजीन के फाउंडिंग एडिटर व टू सर्कल्स डॉट नेट के सीनियर एडिटर रहे हैं। NIA का आरोप था कि वे खुर्रम परवेज़ के करीबी सहयोगी हैं और संगठन के जरिए आतंकवाद को फंडिंग पहुंचाने में शामिल थे। मेहराज ने भी आरोपों से इनकार किया।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और अन्य ने दोनों की रिहाई की मांग की थी। उन्हें “राजनीतिक रूप से प्रेरित” मामलों का शिकार बताया गया।
जमानत का फैसला और इसके मायने
18 जुलाई 2026 को पटियाला हाउस कोर्ट के फैसले ने दोनों को राहत दी। केस RC-37/2020 के तहत यह जमानत मिली। ट्रायल अभी चल रहा है, लेकिन लंबी प्री-ट्रायल हिरासत को कोर्ट ने गंभीरता से लिया।
यह फैसला UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत लंबी हिरासत पर बहस को फिर से जिंदा करता है। UAPA में जमानत मिलना मुश्किल माना जाता है क्योंकि “प्राइमा फेसी सही” होने पर ही जमानत अस्वीकार की जा सकती है। परवेज़ की विकलांगता और मेहराज की पत्रकारिता पृष्ठभूमि ने इस मामले को खास बना दिया।
कश्मीर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर दबाव की कहानी पुरानी है। JKCCS जैसे संगठन दशकों से दस्तावेज तैयार करते आए हैं, लेकिन सरकार इन्हें अलगाववाद और आतंकवाद से जोड़कर देखती है। वहीं कार्यकर्ता कहते हैं कि सच्चाई छिपाने की कोशिश हो रही है।
परिवारों की खुशी और चुनौतियां
परवेज़ और मेहराज की रिहाई पर परिवारों में खुशी की लहर दौड़ी। लेकिन दोनों पर अभी भी शर्तें लागू हो सकती हैं और ट्रायल लंबा खिंच सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस जमानत का स्वागत किया है, लेकिन पूर्ण न्याय की मांग जारी रखी।
यह घटना याद दिलाती है कि कश्मीर का मसला सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि इंसानी हकूक, अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय का भी है। दोनों की रिहाई से उम्मीद जगी है कि संवाद और पारदर्शिता से आगे बढ़ा जा सकता है।
निष्कर्ष
खुर्रम परवेज़ और इरफान मेहराज की जमानत एक छोटी सी जीत है, लेकिन कश्मीर के इतिहास में यह एक यादगार पल बन गया। कानून की प्रक्रिया को सम्मान देते हुए, दोनों को अब परिवार के साथ समय बिताने का मौका मिलेगा। उम्मीद है कि ट्रायल निष्पक्ष होगा और सच्चाई सामने आएगी। कश्मीर में शांति और न्याय की राह अभी लंबी है, लेकिन ऐसे कदम उम्मीद की किरण जरूर जगाते हैं।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
