छह शहरों में निःशुल्क कृत्रिम अंग एवं कैलिपर शिविर, 3,300 से अधिक दिव्यांगजनों को मिला लाभ

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राष्ट्रीय, 17 अगस्त 2026: देश के अलग-अलग शहरों में दिव्यांगजनों को बेहतर पुनर्वास सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नारायण सेवा संस्थान ने छह शहरों में निःशुल्क कृत्रिम अंग एवं कैलिपर फिटमेंट शिविर आयोजित किए। बेंगलुरु, दिल्ली, पुणे, कोयंबटूर, मुंबई और हैदराबाद में लगाए गए इन शिविरों के जरिए करीब 3,300 दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग, कैलिपर और पुनर्वास से जुड़ी जरूरी सेवाएं उपलब्ध कराई गईं।

इन शिविरों की खास बात यह रही कि लाभार्थियों को केवल सहायक उपकरण ही नहीं दिए गए, बल्कि उन्हें उनके इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी, फिजियोथेरेपी, चलने का प्रशिक्षण, परामर्श और जरूरी फॉलो-अप सहायता भी दी गई। इस तरह कोशिश की गई कि कृत्रिम अंग मिलने के बाद दिव्यांगजन उन्हें अपने रोजमर्रा के जीवन में आसानी से इस्तेमाल कर सकें।

1,570 से अधिक कृत्रिम अंग और कैलिपर लगाए गए

शिविरों के दौरान 1,570 से अधिक कृत्रिम अंग और कैलिपर लगाए तथा वितरित किए गए। वहीं करीब 700 लाभार्थियों का माप लिया गया, ताकि उनकी जरूरत के मुताबिक नारायण मॉड्यूलर कृत्रिम अंग तैयार किए जा सकें।

यह प्रक्रिया उन लोगों के लिए खास तौर पर अहम है, जिन्हें उनकी शारीरिक जरूरत के अनुसार उपकरण की आवश्यकता होती है। माप लेने के बाद तैयार किए जाने वाले इन कृत्रिम अंगों का उद्देश्य लाभार्थियों को अधिक सुविधाजनक और जरूरत के अनुरूप सहारा देना है।

हैदराबाद में सबसे ज्यादा लाभार्थियों को मिले उपकरण

छह शहरों में हुए वितरण में हैदराबाद सबसे आगे रहा। यहां 745 लाभार्थियों को 815 नारायण मॉड्यूलर कृत्रिम अंग एवं कैलिपर लगाए गए।

इसके बाद बेंगलुरु में 558 लाभार्थियों को 602 सहायक उपकरण उपलब्ध कराए गए। दिल्ली में 140 लाभार्थियों को 162 कस्टमाइज्ड कृत्रिम अंग एवं कैलिपर लगाए गए, जबकि मुंबई में 104 लाभार्थियों को 154 कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए गए।

पुणे और कोयंबटूर में भी शिविरों के माध्यम से जरूरतमंद दिव्यांगजनों को पुनर्वास सेवाओं और सहायक उपकरणों का लाभ पहुंचाया गया।

पुनर्वास को सिर्फ कृत्रिम अंग तक सीमित नहीं रखा गया

नारायण सेवा संस्थान के इस अभियान में पुनर्वास को व्यापक रूप से देखा गया। कृत्रिम अंग या कैलिपर उपलब्ध कराने के साथ लाभार्थियों को फिजियोथेरेपी और चलने का प्रशिक्षण भी दिया गया। इसके अलावा सहायक उपकरणों को सही तरीके से इस्तेमाल करने की जानकारी और जरूरत के मुताबिक परामर्श भी उपलब्ध कराया गया।

संस्थान के प्रेजिडेंट प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि प्रयास यही है कि ज्यादा से ज्यादा दिव्यांगजन पुनर्वास सेवाओं तक पहुंच सकें। उनके मुताबिक ऐसे शिविरों से कृत्रिम अंग, परामर्श और दूसरी जरूरी सुविधाएं एक ही जगह उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे लाभार्थियों के लिए प्रक्रिया आसान हो जाती है।

प्रशिक्षण और सामुदायिक सहयोग भी जरूरी

संस्थान की डायरेक्टर पलक अग्रवाल ने पुनर्वास के दूसरे पहलुओं पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पुनर्वास सिर्फ कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इसके साथ प्रशिक्षण, फिजियोथेरेपी, तकनीकी मार्गदर्शन और सामुदायिक सहयोग भी जरूरी है।

इन सुविधाओं का मकसद यह है कि दिव्यांगजन कृत्रिम अंग और दूसरे सहायक उपकरणों का बेहतर इस्तेमाल कर सकें और शिक्षा, रोजगार तथा रोजमर्रा की जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए उनका पूरा लाभ उठा सकें। उन्होंने इस अभियान में सहयोग देने वाले सभी सीएसआर भागीदारों का भी आभार जताया।

जापान और जर्मनी की तकनीक पर आधारित कृत्रिम अंग

शिविरों में जापान और जर्मनी की तकनीक पर आधारित 3डी प्रिंटेड मॉड्यूलर कृत्रिम अंगों का इस्तेमाल किया गया। इन उपकरणों के साथ लाभार्थियों को उन्हें इस्तेमाल करने का तरीका भी समझाया गया, ताकि नए कृत्रिम अंग के साथ उनके लिए चलना और दैनिक गतिविधियां करना आसान हो सके।

शिविरों में फिजियोथेरेपी, चलने का प्रशिक्षण और परामर्श जैसी सेवाएं भी दी गईं। जरूरत के मुताबिक आगे की सहायता और फॉलो-अप की सुविधा भी रखी गई, जिससे लाभार्थियों को शिविर के बाद भी जरूरी मार्गदर्शन मिल सके।

अब तक हजारों लोगों तक पहुंची निःशुल्क सेवाएं

नारायण सेवा संस्थान के अनुसार, देशभर में अब तक 40,403 से अधिक दिव्यांगजनों को निःशुल्क कृत्रिम अंग उपलब्ध कराए जा चुके हैं। इसके अलावा 4.01 लाख से अधिक कैलिपर दिए गए हैं और 4,54,585 से ज्यादा लोगों को निःशुल्क चिकित्सा सेवाएं प्रदान की जा चुकी हैं।

छह शहरों में आयोजित ये शिविर इसी प्रयास की एक कड़ी हैं। इनका उद्देश्य जरूरतमंद दिव्यांगजनों को उनकी जरूरत के मुताबिक कृत्रिम अंग और कैलिपर उपलब्ध कराने के साथ उन्हें इनके इस्तेमाल के लिए जरूरी प्रशिक्षण और सहयोग देना है। इस तरह पुनर्वास की सुविधाओं को एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने की कोशिश की गई, ताकि लाभार्थियों के लिए यह पूरी प्रक्रिया अधिक आसान और उपयोगी बन सके।

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