बिहार में दूसरी बार पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर हुआ शोध, अर्चना राय भट्ट को मिली पीएचडी की उपाधि

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पटना (बिहार) :  बिहार में दूसरी बार एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर शोध कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इस शोध का वायवा (मौखिक परीक्षा) मंगलवार, 23 जून 2026 को पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के परिसर में आयोजित हुआ। परीक्षा के बाद सर्वसम्मति से शोधार्थी अर्चना कुमारी उर्फ अर्चना राय भट्ट को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई।

कठिन मेहनत और लगन से हासिल की बड़ी कामयाबी

मजबूत इरादे, लगातार मेहनत और ज्ञान के प्रति समर्पण इंसान को हर मंजिल तक पहुंचा सकता है। अर्चना राय भट्ट ने भी अपनी मेहनत और लगन के दम पर यह मुकाम हासिल किया है।

उन्होंने “पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं एकात्म मानव दर्शन का स्वरूप” विषय पर अपना शोधकार्य सफलतापूर्वक पूरा किया। यह उपलब्धि सिर्फ उनकी व्यक्तिगत शैक्षणिक सफलता नहीं है, बल्कि भारतीय दार्शनिक और वैचारिक परंपरा के अध्ययन में भी एक महत्वपूर्ण योगदान मानी जा रही है।

शुरू से रही पढ़ाई और भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि

अर्चना राय भट्ट शुरू से ही पढ़ाई में गंभीर, जिज्ञासु और भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के प्रति विशेष रुचि रखने वाली छात्रा रही हैं। कठिन परिस्थितियों और कई चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने शोधकार्य को कभी नहीं रोका।

लंबे समय तक लगातार अध्ययन, संदर्भ ग्रंथों का गहन विश्लेषण और विषय की गहरी समझ के आधार पर उन्होंने अपना शोध सफलतापूर्वक पूरा किया। उनकी यह सफलता खास तौर पर उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जो शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना चाहती हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर आधारित है शोध

एकात्म मानव दर्शन की गहराई को समझने का प्रयास

अर्चना राय भट्ट का शोध विषय “पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं एकात्म मानव दर्शन का स्वरूप” भारतीय राजनीतिक और दार्शनिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण विषय है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्वतंत्र भारत को ऐसी वैचारिक दिशा देने का प्रयास किया, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के बीच संतुलित और समन्वित संबंध स्थापित हो। उनका एकात्म मानव दर्शन पश्चिमी पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों से अलग भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इस दर्शन में मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित स्वरूप के रूप में देखा गया है।

समकालीन भारत में भी बताई गई प्रासंगिकता

अपने शोध में अर्चना राय भट्ट ने इस दर्शन के मूल सिद्धांतों, उसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पक्षों के साथ-साथ आज के भारत में उसकी प्रासंगिकता का गहराई से विश्लेषण किया है।

शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि एकात्म मानव दर्शन केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि का व्यापक स्वरूप है। यह समरस समाज, अंत्योदय, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाओं को मजबूत आधार प्रदान करता है।

आज जब दुनिया उपभोक्तावाद, सामाजिक असमानता, पर्यावरणीय संकट और नैतिक मूल्यों के ह्रास जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे समय में यह दर्शन संतुलित और मानवीय विकास का एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत करता है।

वरिष्ठ शिक्षकों के मार्गदर्शन में पूरा हुआ शोध

इस शोधकार्य का निर्देशन पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता एवं संकायाध्यक्ष प्रोफेसर राजीव रंजन ने किया।

इसके अलावा स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अरविन्द कुमार तथा डी.ए.वी. कॉलेज, बी.एच.यू., वाराणसी के विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ इतिहासकार प्रोफेसर विनोद कुमार चौधरी का भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन मिला। उनके शैक्षणिक सहयोग और सुझावों ने इस शोध को मजबूत वैचारिक आधार प्रदान किया।

वायवा परीक्षा में बड़ी संख्या में शिक्षाविद रहे मौजूद

वायवा परीक्षा के दौरान पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर उपेंद्र प्रसाद सिंह, बाह्य पर्यवेक्षक प्रोफेसर विनोद कुमार चौधरी, विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अरविन्द कुमार, शोध पर्यवेक्षक प्रोफेसर राजीव रंजन, डॉ. मुकेश कुमार, प्रोफेसर प्रणय कुमार, प्रोफेसर रंजन कुमार, प्रोफेसर शिव कुमार, इतिहास संकलन योजना, दक्षिण बिहार प्रांत के प्रदेश महासचिव शैलेश कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर कुमार देवेश, राहुल झा, आकाश कुमार, भोलेंद्र कुमार सहित अनेक शिक्षाविद, शोधार्थी और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर सभी विद्वानों ने शोधकार्य की सराहना करते हुए इसे भारतीय वैचारिक परंपरा और आधुनिक विमर्श के बीच मजबूत सेतु स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास बताया।

नई पीढ़ी के लिए बनेगा उपयोगी संदर्भ

अर्चना राय भट्ट की यह उपलब्धि केवल एक शैक्षणिक डिग्री तक सीमित नहीं है। उनका शोध भारतीय चिंतन, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र जीवन के मूल्यों को समझने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

उम्मीद है कि यह शोध भविष्य में विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहास के अध्येताओं के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री साबित होगा। साथ ही यह उपलब्धि इस बात का भी प्रमाण है कि समर्पण, अनुशासन और निरंतर प्रयास से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.

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