दोस्तों, सोशल मीडिया पर एक ही खबर ट्रेंड कर रही है – महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने कमाल कर दिया! 126 सीटें जीत लीं भाई! मतलब 100 से कहीं ज्यादा। मैं खुद हैरान हूं कि एक पार्टी जो पहले सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत मानी जाती थी, वो अब पूरे महाराष्ट्र में अपनी ताकत दिखा रही है। आज इसी पर बात करते हैं, आराम से, जैसे घर में चाय पीते हुए गप्पे मार रहे हों।
सबसे पहले तो ये समझ लो कि ये चुनाव कितने बड़े थे। महाराष्ट्र में 29 बड़े नगर निगमों और कई छोटे निकायों के चुनाव हुए। BMC यानी मुंबई महानगरपालिका से लेकर पुणे, नागपुर, औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर), मालेगांव, नांदेड़ तक – हर जगह वोटिंग हुई। BJP की अगुवाई वाली महायुति ने तो सबसे ज्यादा सीटें जीतीं, लेकिन सरप्राइज पैकेज बनी AIMIM।
रिपोर्ट्स के मुताबिक AIMIM ने कुल 126 सीटें जीतीं। ब्रेकडाउन कुछ ऐसा है:
छत्रपति संभाजीनगर में 33 सीटें (ये सबसे बड़ा झटका, पहले 24 थीं)
मालेगांव में 21
नांदेड़ वाघाला में 14
अमरावती में 12
धुले में 10
सोलापुर में 8
मुंबई में 8
नागपुर में 6
ठाणे में 5
और बाकी अकोला, अहमदनगर, जलना वगैरह में भी कुछ-कुछ।
दोस्तों, ये कोई छोटी जीत नहीं है। 2015-2020 के पुराने चुनावों की तुलना करें तो AIMIM ने दोगुनी से ज्यादा सीटें बढ़ा लीं। पार्टी के अंदर भी काफी झगड़े चल रहे थे – टिकट बंटवारे पर बगावत, कई पुराने पार्षदों को बाहर किया गया, यहां तक कि कुछ बड़े नेता इस्तीफा दे चुके थे। फिर भी ओवैसी ब्रदर्स (असदुद्दीन और अकबरुद्दीन) ने हेलीकॉप्टर लेकर पूरे राज्य में कैंपेन किया, घर-घर गए, रैलियां कीं – और रिजल्ट सबके सामने है।
सबसे इंटरेस्टिंग बात जो मुझे लगी वो ये कि AIMIM अब सिर्फ “मुस्लिम पार्टी” नहीं रह गई। पार्टी के स्टेट प्रेसिडेंट सैयद इम्तियाज जलील ने खुद कहा – “लोगों की ये गलतफहमी दूर हो गई कि हम सिर्फ एक कम्युनिटी की पार्टी हैं।” हिंदू, दलित, आदिवासी कैंडिडेट्स भी AIMIM के टिकट पर जीते। जैसे संभाजीनगर के गुलमंडी वार्ड में, जो शिवसेना-BJP का गढ़ माना जाता था, वहां AIMIM के दो कैंडिडेट जीते। ये दिखाता है कि लोकल इश्यूज पर फोकस करने से वोटर कनेक्ट करता है।
क्यों हुई ये जीत? सिंपल बातें – पानी की समस्या, गंदगी, सड़कें, बिजली। ओवैसी ने रैलियों में यही मुद्दे उठाए। कांग्रेस, शिवसेना, सपा जैसे पुराने दलों पर हमला बोला कि “ये लोग सिर्फ वोट लेते हैं, काम नहीं करते।” खासकर महिलाओं ने बहुत सपोर्ट किया। ओवैसी ने बिहार की जीत का उदाहरण दिया, धार्मिक बातें भी कीं, लेकिन सबसे ज्यादा लोकल गवर्नेंस पर फोकस रहा। मुस्लिम बहुल वार्ड्स में तो वोट कंसोलिडेट हुए ही, लेकिन उससे बाहर भी पार्टी पहुंच गई।
अब इसका राजनीतिक मतलब क्या है? महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स में एक नया प्लेयर मजबूत हो रहा है। BJP को तो फायदा ही हुआ क्योंकि कुछ जगहों पर AIMIM ने विपक्ष के वोट काटे, लेकिन लॉन्ग टर्म में ओवैसी की पार्टी महायुति और महाविकास अघाड़ी दोनों के लिए चैलेंज बनेगी। 2029 के विधानसभा चुनावों में AIMIM और आगे बढ़ सकती है। ओवैसी ने खुद कहा कि वो जनता के हित वाले फैसलों में BJP को सपोर्ट करेंगे, लेकिन गलत नीतियों का विरोध भी करेंगे।
मुझे लगता है ये जीत एक मैसेज है – वोटर अब पुरानी पार्टियों से तंग आ चुका है। लोकल लेवल पर अगर कोई ईमानदारी से काम की बात करे तो वोट मिलता है, चाहे पार्टी कोई भी हो। AIMIM ने ये साबित कर दिया।
आप क्या सोचते हो दोस्तों? क्या ओवैसी महाराष्ट्र में और बड़ा रोल प्ले करेंगे? या ये सिर्फ लोकल इलेक्शन की जीत है? कमेंट में बताओ। और हां, अगर आपको ये पोस्ट पसंद आई तो शेयर जरूर करना।
Report : ismatimes news desk.
