नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026 : देश ने शनिवार को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित किया और अगले कई वर्षों के लिए विकसित भारत का खाका सामने रखा। अपने करीब 75 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, तकनीक, कृषि, रक्षा, युवाओं, हरित अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर जोर दिया। इसी भाषण में उन्होंने नक्सलवाद को लेकर “दिमागी नक्सल” शब्द का इस्तेमाल किया, जिसके बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पर तीखा पलटवार किया।
इस बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में विपक्ष के दो बड़े चेहरे—लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे—लाल किले के कार्यक्रम में नजर नहीं आए। दोनों नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर राजनीतिक चर्चा भी तेज हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, उनके कार्यक्रम में शामिल नहीं होने की वजह के तौर पर प्रोटोकॉल और बैठने की व्यवस्था से जुड़ी आपत्ति बताई गई।
‘दिमागी नक्सल’ पर प्रधानमंत्री का बयान
भाषण का सबसे ज्यादा राजनीतिक असर डालने वाला हिस्सा नक्सलवाद से जुड़ा रहा। प्रधानमंत्री ने कहा कि जंगलों में हथियार उठाने वाले नक्सलवाद की ताकत कमजोर हो चुकी है और कई ऐसे इलाके अब शांति, विकास और नई उम्मीद की ओर बढ़ रहे हैं।
लेकिन इसी के साथ उन्होंने एक नए खतरे की बात करते हुए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री के मुताबिक, ऐसे तत्व समाज में हिंसा और अशांति को बढ़ावा देने के मौके तलाशते हैं और लोगों को गलत दिशा में ले जाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने देशवासियों से ऐसे लोगों को पहचानने और उनसे दूरी बनाने की अपील की।
यह शब्द प्रधानमंत्री के भाषण के बाद तुरंत राजनीतिक बहस का विषय बन गया। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ‘दिमागी नक्सल’ कोई स्थापित कानूनी श्रेणी नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री द्वारा भाषण में इस्तेमाल किया गया राजनीतिक शब्द है।
कांग्रेस ने दिया तीखा जवाब
प्रधानमंत्री के बयान पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री पहले अपने विरोधियों के लिए “अर्बन नक्सल” शब्द का इस्तेमाल करते थे और अब “दिमागी नक्सल” कह रहे हैं। जयराम रमेश ने इसे प्रधानमंत्री की “हताशा” का संकेत बताया।
यानी इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की भाषा और नजरिया बिल्कुल अलग है। प्रधानमंत्री इसे देश में हिंसा और अशांति फैलाने वाली विचारधारा के खिलाफ चेतावनी के तौर पर पेश कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस इसे राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों को निशाना बनाने की कोशिश मान रही है।
राहुल गांधी और खड़गे समारोह से क्यों रहे दूर?
इस साल लाल किले के मुख्य समारोह में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की गैरमौजूदगी भी चर्चा का बड़ा विषय बनी।
रिपोर्टों के मुताबिक दोनों नेताओं ने लगातार दूसरे साल लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा नहीं लिया। सूत्रों के हवाले से बताया गया कि बैठने की व्यवस्था और दूसरे प्रोटोकॉल उनकी संवैधानिक और राजनीतिक स्थिति के अनुरूप नहीं होने की वजह से उन्होंने कार्यक्रम से दूरी बनाई।
राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और इस पद को केंद्रीय मंत्री के बराबर दर्जा प्राप्त है। समारोह से पहले रक्षा मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि उनका स्थान आधिकारिक टेबल ऑफ प्रिसीडेंस के अनुसार तय किया जाएगा।
इस विवाद की पृष्ठभूमि में 2024 का मामला भी है, जब राहुल गांधी को लाल किले के समारोह में पांचवीं पंक्ति में बैठाया गया था। कांग्रेस ने उस समय इसे लेकर सरकार की आलोचना की थी, जबकि रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि व्यवस्था ओलंपिक पदक विजेताओं को सम्मान देने के लिए की गई थी।
इसलिए 2026 की गैरमौजूदगी को समझने के लिए पुराने प्रोटोकॉल विवाद को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
टेलीप्रॉम्प्टर को लेकर क्या है सच्चाई?
मूल पाठ में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान रुकने और टेलीप्रॉम्प्टर से जुड़ी चर्चाओं का जिक्र है। लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोतों की जांच में ऐसा कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिला कि 15 अगस्त 2026 के लाल किले के भाषण में टेलीप्रॉम्प्टर खराब हुआ था या प्रधानमंत्री का रुकना किसी तकनीकी खराबी की वजह से हुआ था।
सोशल मीडिया पर वीडियो या टिप्पणियों के आधार पर किसी तकनीकी कारण को निश्चित तथ्य मानना सही नहीं होगा। इसलिए इस दावे को फिलहाल अपुष्ट मानना ही उचित है।
यह जरूर तथ्य है कि प्रधानमंत्री का इस साल का भाषण करीब 75 मिनट का रहा, जो पिछले चार वर्षों में उनका सबसे छोटा स्वतंत्रता दिवस संबोधन बताया गया है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
