जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के एकमात्र विधायक मेहराज उद्दीन मलिक को जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत सात महीने तक नजरबंद रखने के सरकार के फैसले पर सख्त टिप्पणी करते हुए उन्हें जमानत दे दी है। यह फैसला नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा कानूनों के दायरे पर एक महत्वपूर्ण बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।
क्यों हुई थी गिरफ्तारी?
मेहराज मलिक, जो बटमलू विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, को पिछले साल सितंबर में गिरफ्तार किया गया था। प्रशासन ने उन पर “सार्वजनिक शांति भंग करने और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने” का आरोप लगाते हुए PSA के तहत नजरबंद किया था। यह अधिनियम सरकार को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने की शक्ति देता है।
हाई कोर्ट का तीखा रुख: “मनमानी और दमनकारी”
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार की कार्रवाई पर गहरी चिंता जताई। न्यायमूर्ति विनोद चटर्जी की पीठ ने कहा कि मलिक की नजरबंदी के आदेश में “कोई ठोस या विशिष्ट आधार” नहीं दिया गया था और यह “मनमाना एवं दमनकारी” प्रतीत होता है। अदालत ने कहा कि मौलिक अधिकारों पर PSA का इस्तेमाल “बहुत संयम और न्यायिक समीक्षा” के साथ किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक विरोधियों को चुप कराने के लिए।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: “लोकतंत्र की जीत” बनाम “कानून का पालन”
इस फैसले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया :
AAP ने इसे “लोकतंत्र, न्याय और संविधान की जीत” बताया है। पार्टी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार विपक्षी आवाजों को दबाने के लिए PSA का दुरुपयोग कर रही है।
भाजपा ने कहा है कि सरकार ने कानून-व्यवस्था की चिंताओं के आधार पर कार्रवाई की थी और वह अदालत के फैसले का सम्मान करती है। उनका तर्क है कि PSA जम्मू-कश्मीर में शांति बनाए रखने के लिए एक आवश्यक कानूनी उपकरण है।
अन्य विपक्षी दलों जैसे राष्ट्रीय सम्मेलन और पीडीपी ने भी इस फैसले का स्वागत किया है और PSA के “राजनीतिक दुरुपयोग” पर रोक लगाने की मांग की है।
PSA क्या है और इस पर क्यों है विवाद?
जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) 1978 में बनाया गया एक कानून है जो राज्य सरकार को किसी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए “सार्वजनिक सुरक्षा” के लिए खतरा मानकर नजरबंद करने की शक्ति देता है। आलोचकों का लंबे समय से कहना है कि इस कानून का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को चुप कराने के लिए किया जाता रहा है। यह कानून मानवाधिकार संगठनों द्वारा “कानूनी काले कानून” के रूप में भी चिह्नित किया जाता रहा है।
मेहराज मलिक का मामला एक बार फिर उस नाजुक संतुलन की ओर इशारा करता है, जो किसी भी लोकतंत्र में सुरक्षा चिंताओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बनाए रखना होता है। हाई कोर्ट के इस फैसले ने इस सिद्धांत को मजबूती दी है कि सरकारी शक्तियों का प्रयोग मनमाना नहीं हो सकता और उस पर न्यायपालिका की सख्त निगरानी आवश्यक है। यह फैसला नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करता है।
Report : ITN Desk.
