-एल.एस. हरदेनिया.
भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास अनेक ऐसे महान क्रांतिकारियों से भरा हुआ है, जिनके योगदान को आज भी पूरी तरह याद नहीं किया जाता। ऐसे ही एक महान नाम हैं मौलाना बरकतउल्ला भोपाली। उनके नाम पर भोपाल में स्थापित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके असाधारण संघर्ष की याद भी है।
ऐसे में विश्वविद्यालय का नाम बदलने का प्रस्ताव कई लोगों की नजर में केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय की उपेक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
मौलाना बरकतउल्ला उन शुरुआती क्रांतिकारियों में शामिल थे जिन्होंने महात्मा गांधी के राष्ट्रीय नेतृत्व संभालने से पहले ही भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष शुरू कर दिया था। उन्होंने न केवल देश में बल्कि दुनिया के कई देशों में जाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। उनका मानना था कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिलना चाहिए और इसी उद्देश्य से उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया।
भारत की आज़ादी का संदेश दुनिया तक पहुंचाने के लिए उन्होंने कई भाषाओं का अध्ययन किया। बम्बई और लंदन में रहकर उन्होंने विभिन्न भाषाएं सीखीं ताकि विदेशी समाज और नेताओं तक भारत की बात प्रभावी ढंग से पहुंचा सकें।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मौलाना अपने साथियों के साथ जर्मनी पहुंचे और वहां भारत की स्वतंत्रता के लिए सहयोग जुटाने का प्रयास किया। इसी दौरान उनका संपर्क लाला हरदयाल द्वारा स्थापित गदर पार्टी से हुआ। गदर पार्टी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से अंग्रेजी शासन को समाप्त करने में विश्वास रखती थी।
साल 1915 में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में एक निर्वासित भारतीय सरकार का गठन किया गया। इस सरकार के प्रमुख राजा महेन्द्र प्रताप सिंह बने, जबकि मौलाना बरकतउल्ला को प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस अंतरिम सरकार का मुख्यालय काबुल में स्थापित किया गया था। यह कदम उस दौर में भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक पहचान बनाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।
करीब चार वर्ष बाद यह सरकार मास्को पहुंची, जहां मौलाना बरकतउल्ला की मुलाकात सोवियत क्रांति के महान नेता लेनिन से हुई। इस ऐतिहासिक मुलाकात की याद में मास्को में उनका एक स्मारक भी स्थापित किया गया। बताया जाता है कि बातचीत के दौरान मौलाना ने लेनिन से कहा था कि इस्लाम और कम्युनिज्म के मूल सिद्धांतों में समानताएं हैं। इस पर लेनिन ने सुझाव दिया कि वे यह विचार उन क्षेत्रों में जाकर लोगों तक पहुंचाएं जहां बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रहती है।
प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की जीत के बाद निर्वासित सरकार की गतिविधियां धीरे-धीरे सीमित हो गईं, लेकिन मौलाना बरकतउल्ला ने अपना अभियान नहीं छोड़ा। वे लगातार बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, फ्रांस और अन्य देशों की यात्राएं करते रहे। इस दौरान उन्होंने दुनिया के दूसरे गुलाम देशों में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों से भी संपर्क स्थापित किया।
धीरे-धीरे उनकी पहचान एक अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी के रूप में बनने लगी। वे केवल भारत की आज़ादी के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में उपनिवेशवाद के खिलाफ चल रहे संघर्षों के समर्थक बन गए थे।
स्वास्थ्य लगातार गिरने के बावजूद उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। इसी सिलसिले में वे अमेरिका के कैलिफोर्निया पहुंचे, जहां गदर पार्टी का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। वहीं उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली। हालांकि उनका जीवन विदेशों में बीता, लेकिन उनका उद्देश्य हमेशा भारत की स्वतंत्रता ही रहा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आने वाली पीढ़ियों को मौलाना बरकतउल्ला के योगदान से परिचित कराया जाए। उनके जीवन और संघर्ष को इतिहास के पन्नों में सीमित रखने के बजाय उसे व्यापक रूप से सामने लाया जाए। उनके सम्मान में स्मारक और शोध कार्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि देश उनके योगदान को सही रूप में समझ सके। मौलाना बरकतउल्ला का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान नायकों में शामिल है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका योगदान भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है और उसे सम्मानपूर्वक याद किया जाना चाहिए।
