बिहार की धरती पर एक ऐसी खबर आई है जिसने लोगों के मन में हलचल मचा दी है। यह खबर धर्म, राजनीति और गरीबी के नाजुक रिश्ते को छू रही है। पटना में एक भव्य मंदिर बनाने की बात चल रही है। यह मंदिर सामान्य देवताओं के लिए नहीं, बल्कि एक जीवित नेता के नाम पर है। बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड ने प्रस्ताव रखा है कि पटना में पांच एकड़ जमीन पर करीब 112 करोड़ रुपये खर्च करके एक मंदिर बनाया जाए। इस मंदिर में सोने की ऐसी मूर्ति लगाई जाएगी जो कद-काठी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसी हो। बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. राजन सिंह ने इसे मोदी चालीसा से जोड़ा है और कहा है कि मोदी जी भगवान श्रीराम के अवतार जैसे हैं। यह पूरा प्लान अभी राज्य सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहा है।
बोर्ड की बैठक में क्या हुआ?
29 जुलाई 2026 को बिहार राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की पहली बैठक पुराना सचिवालय में समाज कल्याण विभाग के दफ्तर में हुई। उसी बैठक में डॉ. राजन सिंह ने यह प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि किन्नर समाज का अपना कोई मंदिर नहीं है। इसलिए वे उस व्यक्ति के नाम पर मंदिर बनाना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें अधिकार और सम्मान दिया। 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) कानून का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि इसी कानून की वजह से आज किन्नर भाई-बहन इंस्पेक्टर, कांस्टेबल, डॉक्टर और इंजीनियर बन रहे हैं। बोर्ड के सभी सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और इसे सर्वसम्मति से पास कर दिया।
डॉ. राजन सिंह ने बाद में पत्रकारों से बात करते हुए और विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि मंदिर की लागत 112 करोड़ रुपये रखी गई है और इसके लिए पांच एकड़ जमीन चाहिए। सोने की मूर्ति मोदी जी के कद के बराबर होगी और उसे भगवान श्रीराम के अवतार के रूप में बनाया जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि यह प्रस्ताव अब कैबिनेट सचिवालय के पास गया है और वहां से मंजूरी का इंतजार है। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मोदी जी के सच्चे भक्त हैं तो वे जमीन जरूर देंगे, क्योंकि उन्हीं की वजह से आज यह बोर्ड खड़ा है।
मोदी चालीसा और आस्था का इजहार
इस प्रस्ताव के साथ ही मोदी चालीसा भी सामने आई। दिल्ली के प्रेस क्लब में एक कार्यक्रम में इस चालीसा का पाठ हुआ और मोदी जी की कटआउट के सामने आरती की गई। नारे लगे जैसे जय जय मोदी और हर हर मोदी। डॉ. राजन सिंह ने कहा कि जब तक मंदिर नहीं बनता, तब तक हर गुरुवार को किन्नर समाज के लोग मोदी चालीसा का पाठ करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि मोदी जी उनके भगवान और आराध्य हैं। उनके हिसाब से यह आस्था का इजहार है, कोई राजनीतिक खेल नहीं।
बोर्ड के सदस्य बार-बार कहते हैं कि उनके समाज को पहली बार इतने अधिकार मिले। नौकरियां मिलीं और समाज में उनका सम्मान बढ़ा। इसलिए वे शुक्रिया अदा करने का यह तरीका अपनाना चाहते हैं। कुछ समर्थक इसे निजी आस्था बताते हैं और कहते हैं कि कोई भी अपने विश्वास के अनुसार किसी को भी देवता मान सकता है।
आलोचना का तूफान
लेकिन इस प्रस्ताव ने तीखी आलोचना भी पैदा की। बहुत से लोगों ने इसे हिंदू परंपराओं का अपमान बताया। उन्होंने कहा कि जीवित व्यक्ति को देवता बनाना और उसकी सोने की मूर्ति लगाना धार्मिक परंपराओं के खिलाफ है। मंदिरों में देवताओं की पूजा होती है, राजनीतिक नेताओं की नहीं। सोशल मीडिया पर तेज प्रतिक्रिया आई जहां लोगों ने इसे अंधभक्ति का नमूना कहा।
सबसे बड़ी बात जो आलोचना का केंद्र बनी, वह बिहार की गरीबी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में आधे से ज्यादा परिवार बहुआयामी गरीबी से जूझ रहे हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और रोजगार के बुनियादी मसले अभी भी बहुत बड़े हैं। ऐसे में 112 करोड़ रुपये और पांच एकड़ कीमती जमीन एक मंदिर के लिए मांगना बहुत से लोगों को गलत लग रहा है। आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या यह पैसा और जमीन स्कूलों, अस्पतालों या गरीबी दूर करने के कामों में नहीं लग सकती?
कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि सरकारी बोर्ड जो किन्नर समाज की बेहतरी के लिए बना है, वह ऐसे प्रोजेक्ट कैसे पेश कर सकता है जो राज्य के पैसे मांगता हो। अगर निजी चंदे से बने तो बात अलग है, लेकिन सरकारी मदद मांगना राजनीतिक और संवैधानिक सवाल खड़े करता है।
अभी क्या स्थिति है और आगे क्या होगा?
अभी तक यह केवल एक प्रस्ताव है। राज्य सरकार ने इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया। जमीन आवंटन और फंड की मंजूरी अभी बाकी है। बोर्ड ने मॉडल भी तैयार कर लिया है और कहा है कि मंजूरी मिलते ही भूमि पूजन करवाया जाएगा।
बिहार में पहले भी ऐसे मामले हुए हैं जहां फिल्मी सितारों या राजनीतिक हस्तियों के मंदिर या मूर्तियां बनीं, लेकिन वे ज्यादातर निजी पैसे से होती थीं। इस बार सरकारी बोर्ड की भूमिका और बड़ी रकम की मांग ने इसे अलग बना दिया।
डॉ. राजन सिंह अपने रुख पर अड़े हुए हैं। वे कहते हैं कि आलोचना करने वालों को यह समझना चाहिए कि किन्नर समाज को पहली बार असली अधिकार मिले। उनके हिसाब से यह शुक्रिया है, कोई अपमान नहीं। वे उम्मीद करते हैं कि सरकार जल्द मंजूरी देगी और पटना में यह मंदिर बनकर खड़ा होगा।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आस्था और राजनीति की सीमा कहां तक होनी चाहिए। धार्मिक परंपराओं की रक्षा के साथ-साथ गरीबी से जूझते लोगों की प्राथमिकताएं क्या हों। बिहार जैसे राज्य में जहां विकास की कई चुनौतियां हैं, वहां ऐसे प्रोजेक्ट सार्वजनिक चर्चा का विषय जरूर बनेंगे।
अब देखना यह है कि राज्य सरकार इस प्रस्ताव पर क्या फैसला करती है। क्या जमीन और पैसा मिलेगा या यह प्रस्ताव सिर्फ अखबारों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा। किन्नर समाज की तरफ से यह कदम उनके शुक्रिया का तरीका है, लेकिन आलोचक इसे परंपराओं और प्राथमिकताओं दोनों पर सवालिया निशान लगाते हैं। इस बहस का अंत अभी दूर नजर आता है।
लोग इंतजार कर रहे हैं कि अगले कुछ हफ्तों में क्या होता है। पटना की सड़कों पर यह विषय अभी भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कुछ लोग इसका समर्थन करते हैं तो कुछ कड़ी विरोध। लेकिन सच्चाई यह है कि इस प्रस्ताव ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
