मनुस्मृति एक बार फिर देश की सियासत में चर्चा के बीच आ गई है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे लेकर RSS और BJP पर सीधा निशाना साधा और संविधान को लेकर उनकी ऐतिहासिक सोच पर सवाल खड़े किए।
हैदराबाद के दारुस्सलाम में जलसा-ए-रहमतुल-लिल-आलमीन के दौरान दिए गए अपने भाषण में ओवैसी ने कहा कि भारत ने 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाया था, लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद RSS से जुड़े एक मुखपत्र में संविधान को लेकर आपत्ति जताई गई थी। उनके मुताबिक, उस लेख में मनुस्मृति को संविधान के विकल्प के तौर पर पेश करने की बात कही गई थी।
ओवैसी ने इस पूरे मामले को डॉ. भीमराव आंबेडकर और भारतीय संविधान से जोड़ते हुए RSS और BJP से सवाल किया कि आज संविधान की बात करने वाली राजनीति का इस पुराने विवाद को लेकर क्या रुख है।
ओवैसी ने RSS की पुरानी सोच पर उठाए सवाल
ओवैसी के भाषण का बड़ा हिस्सा संविधान और मनुस्मृति के बीच तुलना पर केंद्रित रहा। उन्होंने कहा कि संविधान देश के लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद है और इसे तैयार करने में डॉ. बीआर आंबेडकर की अहम भूमिका रही।
AIMIM प्रमुख का आरोप था कि RSS के एक पुराने प्रकाशन में संविधान को लेकर असंतोष जाहिर किया गया था। उन्होंने इसी आधार पर संगठन की उस समय की सोच पर सवाल उठाए और पूछा कि अगर संविधान स्वीकार्य नहीं था, तो उसके बजाय मनुस्मृति को बेहतर क्यों माना गया।
यह मुद्दा इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि मनुस्मृति को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस सिर्फ इतिहास तक सीमित नहीं है। इसके साथ सामाजिक बराबरी, महिलाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों जैसे सवाल भी जुड़े हुए हैं।
सावरकर का भी किया जिक्र
ओवैसी ने अपने भाषण में विनायक दामोदर सावरकर का भी उल्लेख किया। उन्होंने अंडमान की सेल्युलर जेल में सावरकर के समय और ब्रिटिश सरकार को लिखे गए पत्रों का हवाला देते हुए उनकी राजनीति पर सवाल उठाए।
इसके साथ ही उन्होंने मौलवी फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी का उदाहरण दिया। ओवैसी ने कहा कि ख़ैराबादी भी अंडमान में कैद रहे और उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ संघर्ष का रास्ता अपनाया।
इस तुलना के जरिए AIMIM प्रमुख ने आज़ादी की लड़ाई में अलग-अलग नेताओं और संगठनों की भूमिका को लेकर अपनी बात रखी।
मौलवी अलाउद्दीन के जरिए आज़ादी की लड़ाई का जिक्र
ओवैसी ने अपने भाषण में हैदराबाद की मक्का मस्जिद के इमाम मौलवी अलाउद्दीन का भी नाम लिया। उन्होंने दावा किया कि अंडमान भेजे गए शुरुआती कैदियों में उनका महत्वपूर्ण स्थान था और उन्हें इस इतिहास में याद किया जाना चाहिए।
उन्होंने BJP और RSS से जुड़े लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ लड़ाई में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों को भी इतिहास का हिस्सा समझना चाहिए।
ओवैसी का यह बयान उनके उस राजनीतिक तर्क का हिस्सा था, जिसमें वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम नेताओं और धार्मिक विद्वानों की भूमिका को सामने रखते हैं।
राहुल गांधी के बयान से भी जुड़ा है विवाद
मनुस्मृति पर ओवैसी की टिप्पणी ऐसे वक्त आई है, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इसी मुद्दे को लेकर BJP और RSS पर हमला कर चुके हैं।
22 अगस्त को पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्रता के सवाल पर मनुस्मृति का जिक्र किया। उन्होंने एक कथित श्लोक का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं को किसी दूसरे व्यक्ति की मिल्कियत की तरह नहीं देखा जा सकता। उनका जोर इस बात पर था कि हर महिला को अपनी पहचान और अपने फैसलों पर खुद अधिकार होना चाहिए।
राहुल गांधी ने कार्यक्रम में पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की अपील भी की। उनके मुताबिक, महिलाओं को पिता, पति या बेटे के साथ रिश्तों से परिभाषित करने के बजाय उन्हें स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए।
BJP ने राहुल गांधी के बयान का विरोध किया
राहुल गांधी के बयान के बाद BJP नेताओं ने उनकी आलोचना की। पार्टी की तरफ से आरोप लगाया गया कि कांग्रेस नेता भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं।
इस तरह मनुस्मृति को लेकर BJP और कांग्रेस के बीच पहले से चल रही राजनीतिक खींचतान में AIMIM प्रमुख ओवैसी की एंट्री ने बहस को और तेज कर दिया है।
असली बहस संविधान बनाम पुरानी सामाजिक व्यवस्था की?
पूरे विवाद को देखें तो मनुस्मृति अब केवल इतिहास की किताबों में मौजूद एक प्राचीन ग्रंथ का सवाल नहीं रह गई है। राजनीतिक दल इसे संविधान, सामाजिक न्याय, महिलाओं की आज़ादी और भारत की ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर देख रहे हैं।
ओवैसी ने जहां मनुस्मृति के बहाने RSS और BJP की पुरानी राजनीतिक सोच पर सवाल उठाया, वहीं राहुल गांधी ने इसे महिलाओं की स्वतंत्रता और पितृसत्ता के मुद्दे से जोड़ा। दूसरी तरफ BJP इन बयानों को भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ़ बताकर जवाब दे रही है।
नतीजा यह है कि एक पुराना ऐतिहासिक विषय मौजूदा सियासत का हिस्सा बन चुका है। आने वाले दिनों में संविधान, मनुस्मृति और सामाजिक बराबरी को लेकर नेताओं के बीच बयानबाज़ी और तेज़ होने की संभावना है।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
