लखनऊ में यूपी कांग्रेस के हालिया संगठनात्मक फेरबदल को पार्टी के अंदरूनी हलकों में महज़ रूटीन बदलाव नहीं माना जा रहा। कई लोग इसे इस संकेत के तौर पर देख रहे हैं कि पार्टी 2027 की विधानसभा चुनावी दौड़ से पहले उत्तर प्रदेश इकाई की कमान एक नई पीढ़ी के नेताओं को सौंप रही है—जिन्हें राहुल गांधी के करीब माना जाता है।
नए इन-चार्ज और उनके डेपुटी: राहुल का हाथ?
6 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव ने राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का नया इन-चार्ज बनाया, और उनके साथ छह सह-इन-चार्ज/सचिव नियुक्त किए—अभिषेक दत्त, कुनאל चौधरी, जगदीश चंद्र जांगिड़, संजीव आर्या, वरुण चौधरी और अब्दुल हन्नान। साथ ही पार्टी ने बाहर जाने वाले पुराने इन-चार्जों—धीरज गुर्जर, नीलांशु चतुर्वेदी, प्रदीप नरवाल, राजेश तिवारी, सत्यनारायण पटेल और तौकीर आलम—की भी सराहना की।
पार्टी के एक वरिष्ठ संगठनात्मक सदस्य का कहना है कि गौतम का तेज़ उदय (जो AAP छोड़कर कांग्रेस आए) पहले से ही चर्चा में है, खासकर उनके राहुल गांधी के करीब होने की वजह से। इतना ही नहीं, अब ये भी चर्चा है कि गौतम को दिए गए नए डेपुटी/सह-इन-चार्ज रायबरेली के सांसद (राहुल गांधी) द्वारा ही चुने गए हैं।
युवा कांग्रेस ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम: प्रदर्शन के दम पर आगे बढ़ना
कांग्रेस के एक फंक्शनरी का दावा है कि यूपी के लिए नियुक्त छह सह-इन-चार्जों को राहुल गांधी ने ‘युवा कांग्रेस ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम’ के तहत तैयार किया था। यह प्रोग्राम 2006 में पंजाब से शुरू हुआ था, जिसका मक़सद पार्टी में युवा नेतृत्व को आगे लाना था। उनका कहना है कि यह पूरा अभ्यास प्रदर्शन (performance) पर आधारित था—जो बेहतर करता है, वही संगठन में ऊपर जाता है, और यूपी के सभी सह-इन-चार्ज इसी रास्ते से गुज़रे हैं।
टीम प्रियंका का दौर: 2019 से 2022 तक का सफ़र
2022 के राज्य चुनावों के दौरान प्रियंका गांधी और उनकी टीम यूपी कांग्रेस की कमान संभाले हुए थीं, हालांकि उनकी यात्रा 2019 में शुरू हुई थी, जब उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की महासचिव (इन-चार्ज) बनाया गया था। उनके साथ एक युवा नेताओं का ग्रुप आया, जो धीरे-धीरे प्रियंका और यूपी के बीच अहम और असरदार कड़ी बन गया। इस ‘टीम प्रियंका’ का मुख्य चेहरा संदीप सिंह थे—पूर्व जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष।
एक पूर्व विभागाध्यक्ष (UPCC) का कहना है कि प्रियंका के निजी सचिव के तौर पर संदीप सिंह का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि वे मामलों को ऐसे नियंत्रित करने लगे, जिससे कई पुराने कार्यकर्ता नाराज़ हुए और कुछ फंक्शनरी practically बेकार-से महसूस करने लगे। अब नई नियुक्तियों के बाद यह माना जा रहा है कि ‘टीम प्रियंका’ किनारे हो गई है।
विवाद की परतें: जेएनयू कनेक्शन और अंदरूनी झगड़ों की बात
उसी पूर्व विभागाध्यक्ष का यह भी कहना है कि संदीप सिंह के दो सहयोगी—प्रदीप नरवाल और तौकीर आलम—भी जेएनयू से थे, और बाद में उन्हें धीरज गुर्जर के साथ AICC सचिव बनाया गया। इनके साथ मोहित पांडे और अनिल यादव को भी wider team में शामिल किया गया, और ये लोग सभी अहम फैसलों में शामिल हो गए। पार्टी के कुछ लोगों का आरोप है कि इसी ग्रुप की वजह से यूपी कांग्रेस—जो भारत के लिए सबसे अहम राजनीतिक इकाइयों में से एक है—में आपसी झगड़े और फ़ैक्शनिज़्म बढ़ा।
पार्टी का जवाब: “न कोई कैंप, न कोई गुटबंदी”
इस बहस को ख़ारिज करते हुए यूपी कांग्रेस के नए इन-चार्ज राजेंद्र पाल गौतम ने साफ़ कहा, “यह सब बकवास है। कोई कैंप नहीं है। कांग्रेस एक पार्टी है। जो ऐसा कह रहे हैं, वे प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।” यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भी इसी लहजे में कहा कि ये सारी “व्याख्याएं” BJP द्वारा गढ़ी गई प्रोपेगेंडा लगती हैं, ताकि 2027 के चुनाव से पहले उनके हौसले पस्त किए जा सकें। उनका कहना है कि BJP हर मोर्चे पर फ़ेल हुई है, और अब अफ़वाहों के ज़रिए कांग्रेस के बेस में कन्फ्यूज़न पैदा करने की कोशिश कर रही है—लेकिन वे कामयाब नहीं होंगे।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
