गया, बिहार — 31 अगस्त 2026। राजनीति में जब सच्चाई बोलती है, तो कुछ ताकतें घबरा जाती हैं। यही हाल हुआ उस वक्त, जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उत्तराखंड के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में एक बड़ी सभा को संबोधित किया। दो दिन बाद वहीँ कुछ लोगों ने मंच का “शुद्धिकरण यज्ञ” किया — गंगाजल छिड़का, हवन किया, और इसे सफ़ाई बताकर पेश किया गया। मगर सवाल ये था कि क्या किसी नेता के भाषण के बाद मंच को “शुद्ध” करने की ज़रूरत होती है?
खड़गे ने इस घटना को संसद में उठाया, इसे अस्पृश्यता करार दिया और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की मांग की। राज्यसभा में भाजपा के जेपी नड्डा ने जांच की बात कही, मगर 20 दिन बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठा। तब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को फिर से उछाला और दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने की ज़िद की।
इसके बाद जो हुआ, वो हैरान करने वाला था। उत्तराखंड और केंद्र सरकार की तरफ से दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय, एक भाजपा कार्यकर्ता की शिकायत पर राहुल गांधी के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करा दी गई। ये कार्रवाई एससी/एसटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं के तहत की गई। आम लोगों में इस पर भारी आक्रोश है — सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या सच बोलने वाले को ही सज़ा मिलनी चाहिए?
बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेताओं ने इस घटना पर गहरी नाराज़गी जताई है। प्रदेश प्रतिनिधि विजय कुमार मिट्ठू, पूर्व विधायक मोहम्मद खान अली, जिला उपाध्यक्ष बाबूलाल प्रसाद सिंह, राम प्रमोद सिंह, गया जिला कांग्रेस अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ अध्यक्ष सुनील कुमार पासवान, धर्मेंद्र कुमार निराला, शिव कुमार चौरसिया और शिवनाथ प्रसाद ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी की। उन्होंने कहा कि गया व्यवहार न्यायालय में “शुद्धिकरण” करने वालों और “डबल इंजन” की सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया जाएगा। साथ ही, जब तक दोषियों पर एफआईआर नहीं होती और राहुल गांधी पर दर्ज मुकदमा वापस नहीं होता, तब तक विरोध जारी रहेगा।
ये सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक संकेत है — कि जब संविधान की रक्षा की बात आती है, तो कुछ ताकतें क्यों घबरा जाती हैं? और जब सच बोलने वाले को ही निशाना बनाया जाता है, तो आम आदमी का भरोसा कैसे बना रहेगा?
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
