शब्द वीणा की साहित्यिक भेंटवार्ता ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ का हुआ ऑनलाइन आयोजन

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औरंगाबाद (बिहार) : राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था “शब्द वीणा” की रविवारीय साहित्यिक भेंटवार्ता ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ का एक और यादगार ऑनलाइन आयोजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुंबई, महाराष्ट्र की वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद् और शब्द वीणा की महाराष्ट्र प्रदेश संरक्षक प्रोफेसर डॉ. कनक लता तिवारी मुख्य अतिथि साहित्यकार के रूप में शामिल हुईं।

कार्यक्रम का संयोजन शब्द वीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी ने किया, जबकि संचालन और वार्ताकार की भूमिका जागृति सिन्हा ने निभाई। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. कनक लता तिवारी द्वारा अपनी स्वरचित सरस्वती वंदना “माँ शारदे तुझको नमन” की मधुर प्रस्तुति से हुई। इसके बाद जागृति सिन्हा ने शब्द वीणा गीत प्रस्तुत कर माहौल को साहित्यिक रंगों से भर दिया।

वार्ता के दौरान जागृति सिन्हा ने डॉ. कनक लता तिवारी के शैक्षणिक, साहित्यिक और रचनात्मक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रश्नोत्तर सत्र में साहित्य की वर्तमान भूमिका, लघुकथा, नवगीत, ग़ज़ल और रचनाओं में सटीक शब्द चयन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

डॉ. कनक लता तिवारी ने कहा कि साहित्य का मूल उद्देश्य समाज में मौजूद बुराइयों और विसंगतियों पर संतुलित ढंग से प्रहार करना है, ताकि लोग जागरूक बनें और एक सभ्य व संस्कारित समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकें। उन्होंने साहित्य, समाज और संस्कृति के बीच मधुर और मजबूत संबंधों की आवश्यकता पर भी अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपनी कई चर्चित रचनाओं का पाठ किया। “मेरी खामोश निगाहों को रुलाए कोई”, “आज तो सूनी हवेली में पुकारे कोई”, “आज धरा पर कितने रावण, कैसे तुम संहार करोगे”, “गीत लिखती हूं, हां मैं गीत लिखती हूं” और “जाने किस बात का बहाना है, चंद लम्हात का फसाना है” जैसी रचनाओं ने श्रोताओं और दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी।

डॉ. कनक लता ने माधव मालती छंद में रचित गीत “कौन मेरे दग्ध उर को दे गया मधुमास फिर से” को भी सुमधुर स्वर में प्रस्तुत किया। वहीं मां पर आधारित उनकी भावुक कविता “दिल बनके जिस्म में धड़क रही हो तुम, हे मां कहां गई हो तुम, वहां बादलों के घर में क्या रह रही हो तुम” सुनकर श्रोता भाव-विभोर हो उठे।

इसके अलावा “नाम तुम्हारा जाने कितनी सदियों, सालों मास लिखा है”, “बजे बाँसुरी, बाजे मीठी-सी धुन, पिया तेरी धुन पर हुई मैं मगन”, “कान्हा तुम अब आ भी जाओ”, “शस्य श्यामल इस धरा पर प्यार हो” तथा “दे आह दिल को मेरे, जगमगा गया कोई” जैसी ग़ज़लों और गीतों को भी खूब सराहना मिली।

दस पुस्तकों की लेखिका और अनेक साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित डॉ. कनक लता तिवारी ने इस अवसर पर आकाशवाणी मुंबई से कहानी वाचन के अपने अनुभव भी साझा किए। वार्ताकार जागृति सिन्हा ने उनकी चर्चित कृतियों “अमलतास के फूल” और “हरा नोट” को लेकर भी सवाल पूछे, जिनका उन्होंने विस्तार से उत्तर दिया।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. कनक लता तिवारी ने नवोदित लेखकों और रचनाकारों को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें सरल, सहज और प्रभावी भाषा में समसामयिक एवं ज्वलंत विषयों पर लगातार लिखते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज को दिशा देने का एक सशक्त माध्यम है और लेखकों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी संवेदनशीलता के साथ करना चाहिए। यह साहित्यिक आयोजन ज्ञान, अनुभव और रचनात्मकता का सुंदर संगम साबित हुआ, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.

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