-एल.एस. हरदेनिया.
दलित होकर तुम कुर्सी पर बैठोगे, तुम्हारी ये हिम्मत। अगर तुम कुर्सी पर बैठोगे तो हम कहां बैठेंगे? यह कहते हुए राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में आजादी के जश्न के दौरान दलितों को जबरदस्ती कुर्सी से उठा दिया गया। उन्हें कुर्सी से उठाने वाले ऊँची जातियों के लोगों का कहना था कि तुम तो पैदा ही हुए हो नीचे बैठने के लिए। कुर्सी पर तो बैठने का हक तो हमारा है।
दलितों का यह अपमान एक सरकारी स्कूल में गत 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस समारोह के दौरान हुआ। भरी सभा में उनका अपमान किया गया। दलितों का कहना था कि कई वर्षों से आजादी के जश्न के दौरान वे स्कूल में नीचे बैठते थे। परंतु इस साल उन्होंने फैसला किया कि वे भी कुर्सियों पर बैठेंगे। ‘‘परंतु ज्यों ही हम कुर्सी पर बैठे कुछ लोग हमारे पास आए और कहा कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। तुम्हें तो नीचे बैठने के लिए ही पैदा किया गया है।’’
दलितों ने अपने इस अपमान की शिकायत पुलिस से की। पुलिस ने संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया। दुःख की बात यह है कि जब उनका अपमान हो रहा था तो श्रोताओं के बीच से किसी ने भी उनके अपमान के विरूद्ध आवाज नहीं उठाई। घटना के बाद यह मामला मीडिया में भी आया। इस तरह की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं।
जब कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर बैठता है तो उसे जबरदस्ती उतार दिया जाता है। यदि कोई दलित किसी सवर्ण के घर के सामने से चप्पल या जूते पहन कर निकलता है तो ऐसा करने पर न सिर्फ उसे मना किया जाता बल्कि दंडित भी किया जाता है। सारे कानूनों के बाद भी आज दलितों का इस तरह का अपमान देश के अनेक स्थानों पर हो रहा है। दलितों को भले ही कानून की तरफ से अधिकार मिलें हों, भले ही सरकार दलितों को नौकरी पर रखे, परंतु आज भी जब उनका अपमान होता है तो लोग उनके साथ खड़े नहीं होते हैं। यह दुःख की बात है।
जैसा कि हम सब जानते हैं बातें तो बहुत की जाती हैं। बड़े-बड़े नेता दलितों के घर पर खाना तक खाते हैं, परंतु जब सामाजिक रूप से उनका अपमान होता है तो कम ही उच्च जाति के लोग उनके समर्थन में आते हैं। यदि अमरीका में यदि काले लोगों (नीग्रो) को अपमानित किया जाता है तो उनके अपमान के विरूद्ध बड़ी संख्या में अमरीका के गोरे लोग खड़े हो जाते हैं।
भले ही राजनैतिक पार्टियों के लोग दलितों के हितों की बात करते हों, पर शायद ही कभी उन्होंने सार्वजनिक रूप से दलितों के अपमान का विरोध किया हो।
