झारखंड प्रदेश, 23 अगस्त 2026। हृदयानंद मिश्र उन सार्वजनिक जीवन के कार्यकर्ताओं में हैं, जिन्होंने राजनीति को सिर्फ चुनावी गतिविधि तक सीमित नहीं माना। उनके लिए राजनीति संगठन, समाजसेवा, जनजागरण और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ जनता के बीच काम करने का माध्यम रही है।
अधिवक्ता, पत्रकार, स्वतंत्र लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान बनी। कांग्रेस संगठन से लंबे समय से जुड़े रहने के साथ उनकी सार्वजनिक यात्रा पांच दशकों से अधिक समय में कई पड़ावों से होकर गुजरी है। छात्र राजनीति से शुरू हुई यह यात्रा बिहार और फिर झारखंड कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में अलग-अलग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंची।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर
हृदयानंद मिश्र की राजनीतिक सक्रियता का आरंभ राष्ट्रीय छात्र संगठन यानी एनएसयूआई से हुआ। वर्ष 1974 से 1978 तक वे बिहार प्रदेश एनएसयूआई के महासचिव रहे और उन्हें उत्तर बिहार का प्रभारी बनाया गया।
इस दौरान उन्होंने छात्र-युवाओं को संगठित करने, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने और नई पीढ़ी को कांग्रेस की विचारधारा से जोड़ने का काम किया।
इसके बाद 14 जनवरी 1981 से 1992 तक वे पलामू जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव रहे। एक दशक से अधिक समय तक जिला संगठन में सक्रिय रहते हुए उन्होंने पलामू में कांग्रेस के संगठनात्मक विस्तार और कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने में योगदान दिया।
वर्ष 1985 से 1990 तक वे गढ़वा जिले के भंडरिया प्रखंड कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।
राजीव गांधी विचार समिति: विचार से सेवा तक
हृदयानंद मिश्र के सार्वजनिक जीवन की एक अलग पहचान राजीव गांधी विचार समिति के गठन और उसके माध्यम से किए गए सामाजिक कार्यों से बनी। वर्ष 1983 में उन्होंने इस समिति की स्थापना की।
समिति का उद्देश्य केवल कांग्रेस की नीतियों और विचारों का प्रचार करना नहीं रहा। समय के साथ इसे सामाजिक जागरूकता और जनसेवा के मंच के रूप में भी विकसित किया गया।
समिति के बैनर तले पलामू प्रमंडल में कई निःशुल्क चिकित्सा और प्री-ऑपरेशन शिविर लगाए गए। स्वास्थ्य जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम हुए और गरीब तथा जरूरतमंद मरीजों के बीच दवाइयों और फलों का वितरण भी किया गया।
विशेष रूप से मोतियाबिंद के 50 से अधिक शिविर आयोजित किए जाने का उल्लेख मिलता है। इन प्रयासों के जरिए ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं और चिकित्सकीय जागरूकता पहुंचाने की कोशिश की गई।
स्वास्थ्य से पर्यावरण और जल संरक्षण तक
समिति ने औषधीय पौधों की उपयोगिता, उनके महत्व और संरक्षण को लेकर जागरूकता कार्यक्रम तथा सेमिनार आयोजित किए। कोशिश यह रही कि औषधीय पौधों से जुड़े विषय केवल चर्चाओं तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें व्यवहारिक स्तर तक ले जाया जाए।
इसी क्रम में जल संरक्षण और जल संचयन जैसे विषयों पर भी सेमिनार आयोजित किए गए।
ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में भी समिति की गतिविधियां सामने आईं। हृदयानंद मिश्र के नेतृत्व में चैनपुर और भंडरिया प्रखंडों में चापाकल लगवाने का काम कराया गया। उस दौर में ग्रामीण इलाकों के लिए यह पहल महत्वपूर्ण थी, क्योंकि कई गांवों में पेयजल की समस्या गंभीर थी।
राजीव गांधी विचार समिति की गतिविधियां सिर्फ पलामू तक सीमित नहीं रहीं। उनके नेतृत्व में पूरे पलामू प्रमंडल में स्वास्थ्य, पर्यावरण, जल संरक्षण, औषधीय पौधों, सामाजिक जागरूकता और जनसेवा से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया गया।
सार्वजनिक जीवन में व्यापक स्वीकार्यता
राजीव गांधी विचार समिति के कार्यक्रमों में अलग-अलग राजनीतिक धाराओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े कई प्रमुख लोगों की भागीदारी रही।
समिति के संरक्षक मंडल में एक समय स्वतंत्रता सेनानी जगनारायण पाठक तथा हुसैनाबाद के विधायक स्वर्गीय हरिहर सिंह जैसे वरिष्ठ व्यक्तित्व रहे। बाद के वर्षों में स्वर्गीय चंद्रशेखर दुबे और पुरकानन अंसारी भी इसके संरक्षक मंडल से जुड़े।
समिति के कार्यक्रमों में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व और जनप्रतिनिधियों की भी भागीदारी रही। इनमें नूर बानो, आलमगीर आलम, फुरकान अंसारी, ददई दुबे, डॉ. प्रदीप कुमार बालमुचू सहित कई राजनीतिक और सामाजिक व्यक्तित्व शामिल रहे।
इससे समिति की गतिविधियों के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संपर्क का संकेत मिलता है।
समिति ने वर्ष 1983 से वर्तमान तक विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित करने की परंपरा भी कायम रखी है। पत्रकारिता के क्षेत्र में दो, समाजसेवा में दो, चिकित्सा में दो, साहित्य में दो तथा कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में दो व्यक्तियों को सम्मानित करने की परंपरा इसके सामाजिक सरोकारों का एक अलग पक्ष सामने रखती है।
कांग्रेस संगठन में लगातार जिम्मेदारियां
हृदयानंद मिश्र की राजनीतिक यात्रा किसी एक पद या किसी एक संगठनात्मक दौर तक सीमित नहीं रही।
वर्ष 1992 से 1995 तक वे बिहार प्रदेश कांग्रेस लेबर सेल के महासचिव रहे। इसके बाद 1995 से 1999 तक बिहार प्रदेश किसान कांग्रेस में संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाई।
वर्ष 1999 से 15 नवंबर 2000 तक वे बिहार प्रदेश पंचायती राज संगठन के उपाध्यक्ष रहे। झारखंड राज्य के गठन के बाद उन्होंने नवगठित राज्य की राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
वर्ष 2000 से 2005 तक वे झारखंड प्रदेश कांग्रेस के विशेष आमंत्रित सदस्य रहे। इसके बाद 2005 से 2013 तक झारखंड प्रदेश कांग्रेस के सचिव तथा रांची जिला कांग्रेस के प्रभारी के रूप में कार्य किया।
वर्ष 2010 में उन्होंने रांची जिला ग्रामीण कांग्रेस के चुनाव अधिकारी की जिम्मेदारी भी निभाई।
इस पूरी संगठनात्मक यात्रा में उनका जोर केवल पद हासिल करने पर नहीं, बल्कि संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखने और कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने पर रहा।
झारखंड आंदोलन से सामाजिक सरोकार तक
झारखंड राज्य के निर्माण के आंदोलन में भी हृदयानंद मिश्र की सक्रिय भागीदारी रही। वे सरकार द्वारा चिन्हित झारखंड आंदोलनकारी हैं।
अलग राज्य की मांग और क्षेत्रीय आकांक्षाओं से जुड़े आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
उनके सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि उन्होंने नौकरी और वकालत के पेशेगत अवसरों से आगे बढ़कर कांग्रेस संगठन और सार्वजनिक जीवन को प्राथमिकता दी।
उनका मानना रहा कि राजनीति का मूल उद्देश्य समाज और जनता के बीच रहकर काम करना तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना है।
गांधीवाद, समाजवाद और लोकतांत्रिक चिंतन
हृदयानंद मिश्र के वैचारिक विकास पर गांधीवाद, समाजवाद और लोकतांत्रिक चिंतन का प्रभाव रहा है। सार्वजनिक जीवन में वे विचारों पर बहस और संवाद को महत्व देते रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक व्यक्तित्वों के साथ उनके वैचारिक संवाद भी उनकी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
इनमें ऑस्कर फर्नांडिस, मोतीलाल वोरा तथा बिहार के पूर्व राज्यपाल डॉ. भीष्म नारायण सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ हुए संवाद भी शामिल रहे। इन चर्चाओं ने उनके राजनीतिक चिंतन और संगठनात्मक अनुभव को व्यापक बनाया।
आज भी जारी है सार्वजनिक जीवन
लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद हृदयानंद मिश्र ने सार्वजनिक गतिविधियों से खुद को अलग नहीं किया है।
वर्तमान में वे झारखंड प्रदेश कांग्रेस समन्वय समिति के सदस्य हैं। वर्ष 2023 से झारखंड सरकार के हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड के सदस्य के रूप में भी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इसके अलावा वे पलामू जिला पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी के सदस्य हैं।
वर्तमान में वे झारखंड प्रदेश राजीव गांधी विचार समिति के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत हैं और समिति की संगठनात्मक गतिविधियां विभिन्न जिलों में संचालित हो रही हैं।
इस तरह वर्ष 1983 में जिस संस्था की स्थापना उन्होंने की थी, उसके साथ उनका जुड़ाव चार दशकों से अधिक समय बाद भी जारी है।
मेदिनी नगर में स्थापना दिवस और राजीव गांधी जयंती समारोह
अभी 20 अगस्त 2026 को उन्होंने अपने नेतृत्व में झारखंड प्रदेश राजीव गांधी विचार समिति की ओर से समिति का स्थापना दिवस एवं राजीव गांधी जयंती समारोह आयोजित किया।
मेदिनी नगर के टाउन हॉल में राजीव गांधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक भव्य सेमिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की प्रशंसा पूरे राज्य में हो रही है।
कार्यक्रम में मनिका विधानसभा क्षेत्र के चार बार के विधायक माननीय रामचंद्र सिंह और गौ सेवा आयोग, झारखंड सरकार के पूर्व सदस्य राजीव रंजन प्रसाद मुख्य अतिथि थे।
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि हृदयानंद मिश्र ने 50 से अधिक वक्ताओं को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया। इसके साथ ही दोनों मुख्य अतिथियों को शॉल एवं मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया।
पत्रकारिता, लेखन और सामाजिक चिंतन
राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के साथ हृदयानंद मिश्र ने पत्रकारिता, स्वतंत्र लेखन और सामाजिक चिंतन को भी अपने सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
वे समकालीन राजनीति, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, इतिहास, जनसरोकार और क्षेत्रीय मुद्दों पर लगातार लिखते रहे हैं।
विशेष रूप से पलामू, गढ़वा और लातेहार क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन तथा स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास के दस्तावेजीकरण में उनकी विशेष रुचि रही है।
वे इस क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों पर शोधपरक ग्रंथ तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसमें मौखिक इतिहास, सरकारी अभिलेख, प्रमाण-पत्र, पुराने समाचार-पत्र, पत्र, तस्वीरें और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों को आधार बनाने का प्रयास है।
इस दृष्टि से उनका लेखन केवल राजनीतिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय इतिहास, सामाजिक स्मृति और जनसरोकारों के दस्तावेजीकरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
एक कार्यकर्ता की निरंतर यात्रा
हृदयानंद मिश्र की सार्वजनिक यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी निरंतरता है।
छात्र संगठन से शुरुआत, जिला कांग्रेस में संगठनात्मक जिम्मेदारी, बिहार प्रदेश कांग्रेस के अलग-अलग प्रकोष्ठों में दायित्व, पंचायती राज संगठन, झारखंड प्रदेश कांग्रेस, झारखंड आंदोलन, राजीव गांधी विचार समिति के माध्यम से स्वास्थ्य एवं सामाजिक सेवा, पत्रकारिता और स्वतंत्र लेखन—इन सभी पड़ावों को एक साथ देखें तो यह किसी एक पद या किसी एक राजनीतिक कालखंड की कहानी नहीं लगती।
यह संगठन और समाज के बीच लगातार सक्रिय रहने वाले एक सार्वजनिक कार्यकर्ता की यात्रा दिखाई देती है।
उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सत्ता के पदों से ज्यादा संगठन और समाज के बीच काम करने को महत्व दिया। यही वजह है कि पांच दशकों से अधिक समय बाद भी वे कांग्रेस संगठन, सामाजिक सेवा, वैचारिक गतिविधियों, पत्रकारिता और इतिहास लेखन से जुड़े हुए हैं।
हृदयानंद मिश्र, अधिवक्ता के लिए सार्वजनिक जीवन किसी एक भूमिका का नाम नहीं रहा। यह संगठन, संघर्ष, समाजसेवा, वैचारिक प्रतिबद्धता, पत्रकारिता और इतिहास-स्मृति को साथ लेकर चलने वाली एक लंबी यात्रा रही है।
एक ऐसी यात्रा, जिसमें राजनीति उनके लिए पद प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि समाज के बीच रहने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाने का माध्यम रही है।
लेखक: कमल किशोर पाण्डेय, समाजसेवी एवं स्वतंत्र पत्रकार।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
