अमित शाह और इस्तीफे का सवाल: जब पेलेट गन से घायल हुए छात्र, तब उठा लोकतंत्र का सवाल

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एक काला दिन जो इतिहास बन गया

20 जुलाई 2026। दिल्ली का जंतर-मंतर। हजारों छात्र सड़कों पर थे, लेकिन उनकी आवाज़ दबाने के लिए सरकार ने वो हथियार चुने जो लोकतंत्र के लिए शर्मनाक थे।

कॉकरोच जंता पार्टी (CJP) का वो आंदोलन, जो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर निकला था, आज भी हर उस नागरिक के ज़ेहन में है जिसने लोकतंत्र में सांस ली है।

क्या था मामला? परीक्षा घोटाले और छात्रों का गुस्सा

नकल और लीक पेपर का सिलसिला

साल 2026 की शुरुआत में ही देश भर में परीक्षा घोटालों की ख़बरें आने लगीं। NEET, UGC-NET, और अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पेपर लीक होने के मामले सामने आए। छात्रों का गुस्सा साफ था। महीनों की मेहनत बर्बाद हो रही थी, और सरकार चुप थी। इसी गुस्से ने ‘कॉकरोच जंता पार्टी’ को जन्म दिया, एक व्यंग्यात्मक युवा आंदोलन जो धीरे-धीरे एक बड़ी ताकत बन गया।

20 जुलाई: संसद चलो मार्च

CJP ने 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च का ऐलान किया। हज़ारों छात्र जंतर-मंतर से संसद की तरफ बढ़े, लेकिन रास्ते में पुलिस की बैरिकेडिंग और संचार ब्लैकआउट ने उन्हें रोक दिया। उस दिन जो हुआ, वो इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज हो गया।

पेलेट गन, ग्रेनेड और बिजली के झटके: पुलिस की बर्बरता

अम्नेस्टी इंटरनेशनल की जांच

24 अगस्त 2026 को अम्नेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे थे। अम्नेस्टी की एविडेंस लैब ने वीडियो, फोटो और गवाहों के बयानों की जांच की। नतीजा साफ था: भारतीय सुरक्षा बलों ने घातक हथियार इस्तेमाल किए थे।

कौन-कौन से हथियार इस्तेमाल हुए?

अम्नेस्टी की रिपोर्ट के मुताबिक:

पेलेट गन: पैरा मिलिट्री के रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों ने भीड़ में गोलीबारी की

टीयर गैस ग्रेनेड: प्रदर्शनकारियों के सिर के ऊपर नहीं, बल्कि सीधे भीड़ की तरफ दागे गए

लाठी (लाठी): UN के मुताबिक यह क्रूर और अमानवीय हथियार है

इलेक्ट्रिक शॉक बैटन: प्रदर्शनकारियों को बिजली के झटके दिए गए

सिविल कपड़ों में लोग: वर्दी में अधिकारियों के सामने सिविल कपड़ों में लोगों ने प्रदर्शनकारियों को पीटा

यह सब उस दिन हुआ जब छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपना हक मांग रहे थे।

सहिल लोचब: वो छात्र जिसकी आँख चली गई

200 पेलेट्स शरीर में, एक आँख की रोशनी गई

सहिल लोचब, 19 साल का दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्र। उस दिन वह भी जंतर-मंतर पर था।

पुलिस की पेलेट गन से चली गोलियों ने उसके शरीर को छलनी कर दिया। AIIMS ट्रॉमा सेंटर में उसका इलाज हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि उसके शरीर में 200 से ज़्यादा पेलेट्स हैं। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि उसकी एक आँख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। डॉक्टरों ने कहा कि आँख वापस आने की उम्मीद 1% से भी कम है।

FIR दर्ज कराने की जद्दोजहद

सहिल और उसकी माँ ने 14 अगस्त को मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करानी चाही। लेकिन पुलिस ने कोई I/O नंबर नहीं दिया, कोई स्वीकृति नहीं दी। 17 अगस्त को फिर कोशिश की, लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं। तब सहिल ने राहुल गांधी की मदद ली।

राहुल गांधी का धरना: 6 घंटे पुलिस स्टेशन के बाहर

21 अगस्त: न्याय की मांग

21 अगस्त 2026 को राहुल गांधी सहिल लोचब और उसकी माँ के साथ संसद स्ट्रीट पुलिस स्टेशन पहुंचे। उनका साफ संदेश था: FIR दर्ज करो, नहीं तो हम नहीं हटेंगे।

DCP सचिन शर्मा से बातचीत भी बेनतीजा रही। तब राहुल गांधी ने धरना शुरू कर दिया।

6 घंटे से ज़्यादा समय तक वे पुलिस स्टेशन के बाहर बैठे रहे। प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य कांग्रेस नेता भी उनके साथ शामिल हुए।

“अमित शाह, न्याय से क्यों डर रहे हो?”

राहुल गांधी ने कहा, “सहिल पर पेलेट गन चली, उसकी आँख गई। दिल्ली पुलिस कहती है पेलेट गन इस्तेमाल नहीं हुई। लेकिन उसके शरीर में पेलेट्स हैं, तो किसी ने तो चलाई होंगी।” उन्होंने सीधे अमित शाह को निशाना बनाया: “अमित शाह जी, आप न्याय से इतने डरे हुए क्यों हैं? यह डर दिखाता है कि आप अपना अपराध मान रहे हैं।” शाम को जब FIR दर्ज हुई, तो राहुल गांधी ने कहा, “यह न्याय की तरफ पहला कदम है।”

अमित शाह से इस्तीफे की मांग: क्यों उठा यह सवाल?

राहुल गांधी का तर्क

राहुल गांधी ने 29 जुलाई को प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा था: “हम अमित शाह को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने ही छात्रों पर गोली चलवाने का आदेश दिया। उन्होंने ही पेलेट गन जैसे घातक हथियार इस्तेमाल करने की इजाजत दी।”

उनका तर्क साफ था: या तो अमित शाह ने आदेश दिया – तो वे अपराधी हैं या उन्हें पता ही नहीं था – तो वे इस पद के लिए अयोग्य हैं। दोनों स्थितियों में इस्तीफा ही एकमात्र रास्ता था।

युवा कांग्रेस का आंदोलन

25 अगस्त को भारतीय युवा कांग्रेस ने BJP मुख्यालय की तरफ मार्च किया। उनका साफ नारा था: अमित शाह को इस्तीफा दो। दिल्ली IYC अध्यक्ष अक्षय लकड़ा ने कहा, “हमें सरकार से जवाब चाहिए। छात्रों को चोट पहुंची, उनकी ज़िंदगियां बर्बाद हुईं, किसने जवाब दिया?”

पंजाब, हिमाचल और देश भर में प्रदर्शन हुए। कहीं-कहीं अमित शाह का पुतला भी जलाया गया।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: जांच कमेटी को काम करने दो

25 अगस्त: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं ने अमित शाह और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की थी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया: “पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी (HPEC) को अपनी जांच जारी रखने दी जानी चाहिए।” यानी कोर्ट ने जांच कमेटी के पुनर्गठन या अमित शाह की भूमिका की अलग से जांच की मांग को नहीं माना।

CRPF की चुप्पी

दिल्ली पुलिस ने बार-बार कहा कि पेलेट गन इस्तेमाल नहीं हुई। लेकिन CRPF, जिसके जवानों ने कथित तौर पर पेलेट गन चलाई, चुप रहा। एक आंतरिक जांच में reportedly सामने आया कि कम से कम 7 राउंड पेलेट एमुनिशन चलाई गई थी।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: अल जज़ीरा की रिपोर्ट

24 अगस्त को अल जज़ीरा ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में अम्नेस्टी की जांच के सभी पहलुओं को उजागर किया गया।

अम्नेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बोर्ड चेयर आकर पटेल ने कहा: “भारतीय अधिकारियों ने विरोध के अधिकार को सुविधाजनक बनाने के बजाय, पहले संचार ब्लैकआउट, बैरिकेड और परिवार व्यवधान से इसे दबाया। फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, पर ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल करके इसे कुचलने की कोशिश की।”

“यह भारी-भरकम जवाब राज्य-प्रायोजित हिंसा थी जिसे भीड़ नियंत्रण के रूप में पेश किया गया।”

संसद का मानसून सत्र: अमित शाह की गैर-हाजिरी

सवाल से बचने की कोशिश?

मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने बार-बार अमित शाह के इस्तीफे का मुद्दा उठाया। लेकिन अमित शाह संसद में नज़र नहीं आए।

AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने नागपुर में कहा, “अमित शाह प्रधान की गैर-हाजिरी के बाद संसद से गायब रहे, और यही इस आंदोलन की उपलब्धि है।”

विपक्ष का हमला

कांग्रेस के सांसद सैयद नसीर हुसैन ने श्रीनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि BJP सरकार ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाब देने से बचने की कोशिश की। उन्होंने पूछा, “दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन है, तो अमित शाह को इस मामले में स्पष्टीकरण देना चाहिए।”

लोकतंत्र का सवाल

20 जुलाई 2026 का दिन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था। यह एक सवाल था जो हर नागरिक के ज़ेहन में है। क्या एक लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर पेलेट गन चलाई जा सकती है? क्या एक छात्र की आँख जाने के बाद भी गृह मंत्री को इस्तीफा नहीं देना चाहिए?

सहिल लोचब की आँख चली गई, लेकिन उसकी आवाज़ नहीं। राहुल गांधी का धरना खत्म हुआ, लेकिन सवाल बाकी है।

अमित शाह के इस्तीफे की मांग सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं है। यह एक सिद्धांत का सवाल है: क्या भारत में लोकतंत्र ज़िंदा है, या सिर्फ दिखावा है? जवाब अभी बाकी है।

रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.

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