सितंबर 2026 के पहले हफ्ते में उत्तराखंड में मदरसों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई का सिलसिला और तेज़ हुआ। देहरादून और हल्द्वानी में पांच और मदरसों पर कार्रवाई की गई। इनमें कुछ संस्थानों को सील कर दिया गया, जबकि दो मदरसों के प्रबंधन ने लिखित रूप से संचालन बंद करने की बात कही।
इन नई कार्रवाइयों के बाद राज्य में अब तक 20 संस्थानों का संचालन रुक चुका है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इनमें 17 संस्थान सील किए गए हैं, जबकि तीन ने अपनी तरफ से संचालन बंद करने की पुष्टि की है।
यह कार्रवाई उस बड़े प्रशासनिक बदलाव के बीच हो रही है, जिसकी शुरुआत जुलाई 2026 में हुई थी। इसी दौरान राज्य सरकार ने पुराने मदरसा बोर्ड से जुड़ा ढांचा खत्म कर अल्पसंख्यक शिक्षा के लिए नया नियामक तंत्र लागू किया।
देहरादून से हल्द्वानी तक पांच संस्थानों पर कार्रवाई
आज़ाद कॉलोनी और मजरा में तीन मदरसे कार्रवाई की जद में
देहरादून में तीन संस्थानों पर प्रशासन ने कार्रवाई की। आज़ाद कॉलोनी स्थित मदरसा जामिया-तुस-सलाम अल-इस्लामिया को सील कर दिया गया।
वहीं आज़ाद कॉलोनी, मजरा स्थित मदरसा दार-ए-अरकम के प्रबंधन ने लिखित वचनपत्र देकर संस्थान का संचालन बंद करने की बात कही। मदरसा दारुल उलूम रहिमिया की ओर से भी इसी तरह का लिखित आश्वासन दिया गया है।
हल्द्वानी में भी दो मदरसों पर सीलिंग की कार्रवाई हुई। इनमें शनि बाज़ार रोड, गौजाजली नॉर्थ स्थित मदरसा जामिया नूरिया बरकते आमिना शामिल है। इसके अलावा इंदिरा नगर, बनभूलपुरा में संचालित एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को भी सील किया गया।
हल्द्वानी के सिटी मजिस्ट्रेट ए. बी. वाजपेयी के मुताबिक प्रशासन ने संबंधित संस्थानों से मान्यता से जुड़े दस्तावेज मांगे थे। दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाने के बाद नियमों के तहत सीलिंग की कार्रवाई की गई।
मदरसा शिक्षा के लिए उत्तराखंड में बदला कानूनी ढांचा
पुराने मदरसा बोर्ड की जगह USAME का गठन
जुलाई 2026 में उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किया गया। राज्य ने उत्तराखंड मदरसा एजुकेशन बोर्ड एक्ट, 2016 और गैर-सरकारी अरबी-फ़ारसी मदरसा मान्यता नियम, 2019 को हटाकर माइनॉरिटी एजुकेशन एक्ट, 2025 और उत्तराखंड माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स रिकग्निशन रूल्स, 2026 लागू किए।
नए ढांचे के तहत उत्तराखंड स्टेट अथॉरिटी फॉर माइनॉरिटी एजुकेशन (USAME) का गठन किया गया है। इसका दायरा राज्य में अधिसूचित छह अल्पसंख्यक समुदायों—मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध—के शैक्षणिक संस्थानों तक बताया गया है।
सरकार का तर्क है कि नए सिस्टम का मकसद अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर करना, आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देना और बिना मान्यता चल रहे संस्थानों को नियामक दायरे में लाना है।
मुख्यमंत्री धामी का रुख क्या है?
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य से समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार का जोर इस बात पर है कि शिक्षण संस्थान निर्धारित मानकों का पालन करें और बच्चों को बेहतर तथा आधुनिक शिक्षा मिले।
सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि मान्यता और दूसरे निर्धारित नियमों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई आगे भी जारी रह सकती है।
कार्रवाई के बीच बच्चों की पढ़ाई को लेकर चिंता
सरकार जहां मान्यता और शिक्षा के मानकों को कार्रवाई की वजह बता रही है, वहीं दूसरी तरफ इस पूरी प्रक्रिया को लेकर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ने वाले असर की चिंता भी सामने आ रही है।
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों का मानना है कि अगर किसी संस्था में कमियां हैं तो उसे सीधे बंद करने के बजाय सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक पाठ्यक्रम में गणित, विज्ञान, कंप्यूटर और अंग्रेज़ी जैसे विषयों को मजबूत किया जा सकता है, शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जा सकता है और संस्थानों को मान्यता की प्रक्रिया पूरी करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई से प्रभावित बच्चों को मान्यता प्राप्त स्कूलों में दाखिला दिलाने में मदद की जाएगी। हालांकि, इस प्रक्रिया में बच्चों की पढ़ाई के साथ उनकी धार्मिक शिक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
मदरसा शिक्षा और धार्मिक तालीम का सवाल
मुस्लिम परिवारों के लिए कुरआन की शिक्षा क्यों अहम है?
मुस्लिम समाज में कुरआन की तालीम को बचपन की बुनियादी धार्मिक शिक्षा का हिस्सा माना जाता है। कुरआन की तिलावत, धार्मिक जानकारी, अखलाक़ और इबादत से जुड़े तौर-तरीकों की शुरुआती शिक्षा आम तौर पर परिवार और धार्मिक शिक्षण संस्थानों के जरिए दी जाती है।
यही वजह है कि मदरसों पर कार्रवाई की बहस सिर्फ मान्यता या पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहती। इससे यह सवाल भी जुड़ जाता है कि अगर किसी मदरसे का संचालन बंद होता है तो वहां पढ़ने वाले बच्चों की धार्मिक और सामान्य शिक्षा का इंतज़ाम किस तरह किया जाएगा।
सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा को लेकर संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28 सरकारी फंड से पूरी तरह चलने वाले शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के संबंध में विशेष प्रावधान करता है। ऐसे संस्थानों में धार्मिक शिक्षा दिए जाने पर संवैधानिक रोक है।
वहीं सरकारी मान्यता या सहायता प्राप्त संस्थानों के मामले में किसी विद्यार्थी को धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ परिस्थितियों में अभिभावक की सहमति की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए सरकारी स्कूल और धार्मिक शिक्षा देने वाले निजी या अल्पसंख्यक संस्थानों की संवैधानिक स्थिति एक जैसी नहीं है।
अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकार भी संविधान का हिस्सा हैं
अनुच्छेद 25 से 30 तक क्या व्यवस्था है?
संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक मामलों और संस्थानों के प्रबंधन से जुड़े अधिकार देता है।
इसके साथ ही अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान रखते हैं। अनुच्छेद 30(1) धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार देता है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि ऐसे संस्थान हर प्रकार के सरकारी नियमन से बाहर हैं। शिक्षा के मानक, मान्यता और विद्यार्थियों के हित से जुड़े उचित नियम राज्य द्वारा बनाए जा सकते हैं। असली कानूनी सवाल यह होता है कि ये नियम अल्पसंख्यक संस्थानों के संवैधानिक अधिकारों के साथ किस हद तक संतुलित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले से क्या संकेत मिलता है?
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा से जुड़े कानून पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। अदालत ने शिक्षा के मानकों को तय करने की राज्य की शक्ति और अल्पसंख्यक संस्थानों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 21A के तहत बच्चों के शिक्षा के अधिकार और अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों को साथ पढ़ना होगा।
इसका व्यापक संदेश यही है कि सरकार शिक्षा की गुणवत्ता और नियमन के लिए नियम बना सकती है, लेकिन अल्पसंख्यक संस्थानों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
उत्तराखंड का नया नियामक ढांचा भी इसी संवैधानिक संतुलन के भीतर काम करने का दावा कर रहा है। आने वाले समय में इस व्यवस्था की व्यावहारिक और कानूनी जांच महत्वपूर्ण होगी।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
मदरसों की मान्यता और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर विवाद का सबसे व्यावहारिक रास्ता कार्रवाई और सुधार के बीच संतुलन में दिखाई देता है।
मान्यता की प्रक्रिया आसान, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए, ताकि छोटे संस्थान भी निर्धारित शर्तें पूरी करके कानूनी दायरे में आ सकें। पाठ्यक्रम में धार्मिक शिक्षा के साथ गणित, विज्ञान, कंप्यूटर और अंग्रेज़ी जैसे आधुनिक विषयों की बेहतर व्यवस्था भी की जा सकती है।
सबसे अहम बात यह है कि किसी संस्था पर कार्रवाई होने की स्थिति में वहां पढ़ रहे बच्चों की पढ़ाई अचानक न रुके। उनके लिए नज़दीकी मान्यता प्राप्त संस्थानों में वैकल्पिक व्यवस्था हो और अभिभावकों को भी स्पष्ट जानकारी दी जाए।
मदरसा शिक्षा ने लंबे समय से भारतीय समाज में धार्मिक और शैक्षणिक भूमिका निभाई है। इसलिए सुधार की जरूरत और बच्चों की धार्मिक-सांस्कृतिक शिक्षा की जरूरत को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय ऐसी व्यवस्था तैयार करना अधिक उपयोगी होगा, जिसमें मान्यता, आधुनिक शिक्षा, धार्मिक तालीम और बच्चों के अधिकार—चारों के बीच संतुलन कायम रहे।
रिपोर्ट : मोहम्मद इस्माइल.
