आजकल राजनीति में विज्ञापन और प्रचार का खेल काफी जोरों पर है। सरकारें अपनी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के नाम पर भारी-भरकम रकम खर्च कर रही हैं। लेकिन जब आंकड़े सामने आते हैं तो सवाल भी खड़े हो जाते हैं – क्या ये खर्च सिर्फ जानकारी फैलाने के लिए है या छवि बनाने का भी हिस्सा? हाल ही में न्यूजलॉन्ड्री की एक रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के विज्ञापन खर्च को लेकर काफी चर्चा छेड़ दी है। आधिकारिक बजट दस्तावेजों पर आधारित ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
योगी सरकार का आठ साल का विज्ञापन खर्च
न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तर प्रदेश सरकार के बजट दस्तावेजों का विश्लेषण करके बताया कि वित्त वर्ष 2017-18 से 2024-25 तक, यानी करीब आठ साल में, राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने विज्ञापन और प्रचार-प्रसार पर कुल 6,811.94 करोड़ रुपये खर्च किए। अगर इसे रोजाना के हिसाब से देखें तो औसतन करीब 2.32 करोड़ रुपये प्रति दिन बनते हैं।
ये खर्च मुख्य रूप से सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के जरिए हुआ। साल-दर-साल आंकड़े देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है:
2017-18 में 294.86 करोड़ रुपये
2018-19 में 330 करोड़ रुपये
2019-20 में 481.67 करोड़ रुपये
2020-21 (कोविड का साल) में घटकर 392.88 करोड़ रुपये
उसके बाद तेजी से बढ़ोतरी – 2021-22 में 1,134.31 करोड़ रुपये
2022-23 में रिकॉर्ड 1,420.03 करोड़ रुपये (राज्य विधानसभा चुनाव का साल)
2023-24 में 1,366.34 करोड़ रुपये
2024-25 में 1,391.18 करोड़ रुपये
कोविड के एक साल को छोड़कर खर्च लगातार बढ़ता गया। 2025-26 के लिए विभाग को 918.83 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान दिया गया है। अगर ये पूरा खर्च हो गया तो नौ साल में कुल रकम करीब 7,730 करोड़ रुपये के पार पहुंच जाएगी, यानी रोजाना औसतन 2.35 करोड़ रुपये।
कहां गया सबसे ज्यादा पैसा?
इन आठ सालों में कुल खर्च का 83 प्रतिशत से ज्यादा, यानी 5,658.16 करोड़ रुपये, सिर्फ “विज्ञापन और दृश्य प्रचार” मद में गया। ये पैसा अखबारों, टेलीविजन चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर खर्च हुआ। 2017-18 में इस मद में 236.33 करोड़ रुपये थे, जो 2024-25 में बढ़कर 1,205.06 करोड़ रुपये हो गए।
दूसरा बड़ा हिस्सा प्रकाशनों पर गया – सरकारी पुस्तिकाएं, पैम्फलेट्स और किताबें – कुल 896.64 करोड़ रुपये। फील्ड पब्लिसिटी पर 220.49 करोड़, फिल्म प्रोडक्शन पर 20.32 करोड़, कम्युनिटी रेडियो-टीवी पर 11.46 करोड़ और फोटो सर्विसेज पर 7.73 करोड़ रुपये खर्च हुए।
ये सिर्फ सूचना विभाग का खर्च है। अन्य विभाग भी अपनी तरफ से विज्ञापन देते हैं। मिसाल के तौर पर उद्योग विभाग ने 2024-25 और 2025-26 में करीब 60 करोड़ रुपये प्रचार पर खर्च किए, जिसमें कुंभ मेले और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसी योजनाओं का भी हिस्सा शामिल है।
केंद्र सरकार से तुलना
तुलना के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के आंकड़े देखें। लोकसभा में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री एल. मुरुगन के जवाब के मुताबिक, 2014-15 से 2024-25 तक के 11 साल में केंद्र सरकार ने विज्ञापनों पर कुल 5,987.46 करोड़ रुपये खर्च किए। ये लगभग 6,000 करोड़ रुपये बैठते हैं और रोजाना औसतन करीब 1.5 करोड़ रुपये।
यानी योगी सरकार का रोजाना का औसत खर्च केंद्र सरकार से ज्यादा है, भले ही अवधि कम हो। न्यूजलॉन्ड्री की रिपोर्ट में यही बात साफ कही गई है कि यूपी का डेली स्पेन्ड केंद्र से आगे निकल गया।
पारदर्शिता का सवाल
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। न्यूजलॉन्ड्री ने आरटीआई के जरिए ये जानने की कोशिश की कि ये विज्ञापन किस-किस मीडिया हाउस को मिले, लेकिन राज्य सरकार ने ज्यादातर मामलों में जानकारी नहीं दी। कुछ आवेदन बिना जवाब के रह गए, कुछ में कहा गया कि इतने बड़े पैमाने की जानकारी जुटाने में समय लगेगा। 2021 में एक पुरानी आरटीआई से पता चला था कि एक साल में टीवी विज्ञापनों पर 160 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जिसमें नेटवर्क18 ग्रुप को 28.82 करोड़ रुपये मिले थे।
अखबारों में भी ये विज्ञापन आसानी से दिख जाते हैं। जुलाई 2026 में सिर्फ 29 दिनों में दैनिक जागरण के लखनऊ संस्करण में 54 और हिंदुस्तान में 49 सरकारी विज्ञापन छपे। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी कैंपेन चल रहे हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े?
ये आंकड़े सरकारी बजट दस्तावेजों और संसदीय जवाबों पर आधारित हैं, इसलिए इनकी प्रामाणिकता पर शक की ज्यादा गुंजाइश नहीं। न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी बजट वेबसाइट (budget.up.nic.in) से डेटा लिया है और केंद्र के आंकड़े लोकसभा के रिकॉर्ड से हैं। द वायर, सियासत और अन्य मीडिया आउटलेट्स ने भी इन आंकड़ों को रिपोर्ट किया है।
सरकार का पक्ष ये हो सकता है कि इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य में योजनाओं की जानकारी पहुंचाने के लिए विज्ञापन जरूरी हैं। विकास कार्यों को जनता तक पहुंचाना भी प्रशासन का काम है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि इतना बड़ा खर्च टैक्सपेयर्स के पैसे से छवि निर्माण की तरफ ज्यादा झुका लगता है, खासकर चुनाव वाले सालों में जब खर्च चरम पर पहुंच जाता है।
कुल मिलाकर, आंकड़े साफ हैं। योगी सरकार ने आठ साल में विज्ञापन और प्रचार पर 6,811.94 करोड़ रुपये खर्च किए, रोजाना औसतन 2.32 करोड़। केंद्र सरकार ने 11 साल में करीब 6,000 करोड़ खर्च किए, रोजाना 1.5 करोड़ के आसपास। बाकी फैसला पाठक खुद कर सकते हैं कि ये खर्च कितना जरूरी था।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
