औरंगाबाद कोर्ट का बड़ा फैसला: अपहरण और छेड़छाड़ मामले में दोषी को सज़ा, अदालत ने अधिवक्ताओं को आधुनिक तकनीक अपनाने की दी सलाह

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औरंगाबाद (बिहार): व्यवहार न्यायालय, औरंगाबाद में गुरुवार, 9 जुलाई 2026 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रथम विश्व विभूति गुप्ता की अदालत ने टंडवा थाना कांड संख्या 58/08, जी.आर. संख्या 2312/08, एस.टी.आर. संख्या 78/09 एवं 44/23 से जुड़े मामले में सज़ा के बिंदु पर सुनवाई करते हुए दोषी को सज़ा सुनाई।

इस मामले की जानकारी देते हुए अपर लोक अभियोजक (ए.पी.पी.) रामनरेश प्रसाद ने बताया कि मुख्य अभियुक्त रंजीत राजवंशी को 18 जून 2026 को अदालत ने दोषी करार दिया था। दोष सिद्ध होने के बाद उसका बंध-पत्र विखंडित कर उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था।

सज़ा के बिंदु पर सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय दंड विधान की धारा 363 के तहत एक वर्ष छह माह के कारावास और 5,000 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई। वहीं धारा 354 के तहत एक वर्ष के कारावास के साथ 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

मामले से जुड़े अधिवक्ता ने बताया कि सज़ा सुनाए जाने के दौरान अभियुक्त, उसकी पत्नी और उसकी चार बेटियां अदालत में हाथ जोड़कर रोने लगीं। यह दृश्य देखकर न्यायाधीश भी कुछ समय के लिए भावुक हो गए। इसके बाद अदालत ने नियमानुसार सज़ा सुनाई।

अधिवक्ता के अनुसार, इस मामले की प्राथमिकी 15 अक्टूबर 2018 को दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी का शादी की नीयत से अपहरण किया गया था। बाद में लड़की 14 अगस्त 2008 को अपने घर वापस लौट आई थी।

सुनवाई के दौरान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने विभिन्न मामलों में सामने आ रही व्यावहारिक समस्याओं पर भी चिंता जताई। उन्होंने वरीय चिकित्सा पदाधिकारी को अदालत में बुलाकर निर्देश दिया कि हिंसा से जुड़े मामलों में जख्म प्रतिवेदन समय पर प्रस्तुत किया जाए। नाबालिग मामलों में माता-पिता का मंतव्य प्रतिवेदन में अवश्य दर्ज किया जाए और पीड़ित की उम्र का भी स्पष्ट उल्लेख करने का प्रयास किया जाए। साथ ही गवाही समय पर सुनिश्चित कराने पर भी ज़ोर दिया गया।

अदालत ने जिला विधिज्ञ संघ और अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष से भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता (बी.एन.एस.) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एस.एस.) लागू होने के बाद अनुसंधान प्रक्रिया आधुनिक तकनीक से काफी सशक्त हो गई है। ऐसे में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं के लिए भी ई-साक्ष्य, कंप्यूटर, लैपटॉप, 5जी मोबाइल और आधुनिक तकनीकों की जानकारी बेहद आवश्यक हो गई है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिवक्ताओं को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना चाहिए। अदालतें अब धीरे-धीरे पेपरलेस व्यवस्था की ओर बढ़ रही हैं और ऑनलाइन फाइलिंग व्यवस्था शत-प्रतिशत सफल साबित हो रही है। ऐसे में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं को भी अधिक से अधिक आधुनिक तकनीक का उपयोग शुरू कर देना चाहिए।

रिपोर्ट : अजय कुमार पाण्डेय.

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