गगनचुंबी इमारतों से नहीं, जनहित से लिखी जाती है विकास की असली गाथा : अपराजिता मिश्रा

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झारखंड प्रदेश, 2 सितंबर 2026: विकास का मतलब सिर्फ ऊंची इमारतें, चमचमाती सड़कें और कागजों पर दिखाई देने वाले बड़े-बड़े आंकड़े नहीं हैं। विकास की असली तस्वीर तब सामने आती है, जब उसका फायदा समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचता है। लेखिका अपराजिता मिश्रा का मानना है कि किसी भी शासन और नेतृत्व की कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना जनता के जीवन में आया वास्तविक बदलाव होना चाहिए।

उनका कहना है कि कुछ दिनों तक चमकने वाली सड़कें, जल्द जर्जर हो जाने वाले पुल, ऊंची इमारतें और सरकारी आंकड़े अपने आप में विकास का प्रमाण नहीं हो सकते। जब गांव में रहने वाले व्यक्ति को बेहतर सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधा मिले, तभी विकास को सही मायने में सार्थक माना जा सकता है।

विकास की रोशनी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना जरूरी

अपराजिता मिश्रा के मुताबिक विकास की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसकी रोशनी समाज के उस व्यक्ति तक कितनी पहुंची, जो अब तक मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहा है।

जब आम आदमी को अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस हो, उसे अपनी सुरक्षा का भरोसा मिले और शासन की संवेदनशीलता जमीन पर नजर आए, तभी विकास की बात पूरी मानी जा सकती है।

किसी दूर शहर में खड़ी शानदार इमारत उस गांव के लिए विकास का प्रमाण नहीं बन सकती, जहां आज भी अच्छी सड़क, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और रोजगार के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं।

नेतृत्व की पहचान वैभव से नहीं, जनसेवा से

उन्होंने कहा कि राजा हो या आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का शासक, उसकी महानता उसके वैभव से नहीं बल्कि जनता के प्रति उसके समर्पण से तय होती है।

एक जिम्मेदार नेतृत्व को हर नागरिक को समान नजर से देखना चाहिए। नागरिक की जाति, धर्म या सामाजिक वर्ग उसके अधिकारों का आधार नहीं बनना चाहिए। हर व्यक्ति सम्मान, अवसर और न्याय का हकदार है।

उनके अनुसार चुनाव और वोट से आगे भी समाज और शासन की बड़ी जिम्मेदारियां हैं। सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि जनता केवल मतदाता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत है।

कागजों का विकास नहीं, जमीन पर बदलाव जरूरी

कागजों पर योजनाओं और उपलब्धियों को दिखाना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना ही किसी नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा है।

विकास का मतलब तब पूरा होगा, जब किसान को उसकी मेहनत का सम्मान और उचित अवसर मिले, मजदूर के हाथों को काम मिले, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और हर जरूरतमंद को बेहतर चिकित्सा उपलब्ध हो। युवाओं को अपनी क्षमता के मुताबिक आगे बढ़ने का मौका मिले और गरीब तथा मध्यम वर्ग के लोगों को यह भरोसा हो कि मुश्किल वक्त में व्यवस्था उनके साथ खड़ी है।

जाति और वर्ग की दीवारों से ऊपर उठना होगा

अपराजिता मिश्रा ने समाज को जाति और वर्ग के आधार पर बांटने की प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि बंटा हुआ समाज अपनी पूरी सामूहिक शक्ति के साथ आगे नहीं बढ़ सकता।

जातीय और सामाजिक दूरी जितनी बढ़ेगी, विकास की राह उतनी ही कठिन होगी। इसके उलट जब शासन नागरिकों को उनकी पहचान से पहले एक समान अधिकार रखने वाले इंसान और नागरिक के रूप में देखेगा, तब समाज में विश्वास मजबूत होगा।

यही विश्वास आगे चलकर देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

इमारतें पुरानी होंगी, लेकिन अच्छे कर्म याद रहेंगे

उन्होंने कहा कि समय के साथ नई इमारतें पुरानी पड़ जाएंगी, सड़कें टूटेंगी, स्मारकों पर धूल जम जाएगी और सत्ता के सिंहासन भी बदलते रहेंगे। लेकिन जिस नेतृत्व ने अपने कार्यकाल में लोगों का जीवन बेहतर बनाने की कोशिश की, न्याय दिलाया और समाज को जोड़ने का काम किया, उसकी याद लंबे समय तक कायम रहती है।

सच्चा शासक वह नहीं है जिसकी तस्वीर हर गली, दीवार और चौराहे पर दिखाई दे। असली जननेता वह है जिसकी नीतियों का असर लोगों के घरों और जीवन में महसूस किया जाए।

सत्ता नहीं, सेवा को बनाना होगा लक्ष्य

अपराजिता मिश्रा के विचार में नेतृत्व की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सत्ता का इस्तेमाल जनसेवा के लिए करना है। वोटों की संख्या को केवल राजनीतिक उपलब्धि मानने के बजाय जनता को अपने बड़े परिवार की तरह देखना चाहिए।

ऐसे नेतृत्व को अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिए अलग से इतिहास लिखवाने की जरूरत नहीं पड़ती। उसके काम ही उसकी पहचान बन जाते हैं और समय स्वयं उसके योगदान का गवाह बनता है।

जननायक वही, जो समाज को जोड़े

एक सच्चा जननायक समाज को बांटकर अपनी सत्ता मजबूत नहीं करता, बल्कि अलग-अलग वर्गों के बीच भरोसा कायम करके राष्ट्र को मजबूत करता है।

सत्ता स्थायी नहीं होती। आज जो व्यक्ति सिंहासन पर है, कल उसकी जगह कोई और होगा। आज की नई इमारतें भी समय के साथ पुरानी पड़ जाएंगी और सत्ता के गलियारों में गूंजने वाले नाम आने वाले समय में इतिहास के पन्नों तक सीमित हो सकते हैं।

लेकिन जिसने गरीब को सम्मान दिया, युवाओं को अवसर दिलाया, किसानों और मजदूरों की तकलीफ समझी, समाज को जातियों में नहीं बल्कि इंसानों के रूप में देखा और अपनी सत्ता को जनसेवा के लिए समर्पित किया—उसका काम लंबे समय तक याद किया जाता है।

जिस नेतृत्व ने किसी गरीब की झोपड़ी में उम्मीद का दिया जलाया हो, उसकी कहानी प्रचार की मोहताज नहीं होती। जनता खुद उसके काम को याद रखती है और समय के साथ उसकी गाथा आगे बढ़ाती है।

आखिरकार सत्ता का दौर भले ही छोटा हो, लेकिन अच्छे कर्मों की उम्र बहुत लंबी होती है।

लेखिका : अपराजिता मिश्रा.

प्रेषक : विश्वनाथ आनंद.

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