झारखंड, 14 सितंबर 2026। भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ राजधानी और बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। देश के गांवों, जंगलों, पहाड़ी इलाकों और दूर-दराज के क्षेत्रों से निकलकर सामान्य परिवारों के युवा जब सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाते हैं, तो लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत होती हैं।
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के एक सुदूर गांव से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाली आशिका कुजूर इसी लोकतांत्रिक संभावना का उदाहरण हैं। कम उम्र में ग्रामीण और आदिवासी पृष्ठभूमि से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंचना निश्चित रूप से आसान सफर नहीं रहा होगा।
इसके पीछे संघर्ष, अध्ययन, संगठन के प्रति निष्ठा और लोगों के बीच लगातार काम करने की क्षमता जैसे कई पहलू दिखाई देते हैं।
आज आशिका कुजूर की राजनीतिक पहचान जशपुर और छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। उन्हें कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यक्रम ‘गूंज’ की राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा आदिवासी कांग्रेस में राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी के साथ उन्हें झारखंड प्रदेश कांग्रेस आदिवासी कांग्रेस का प्रभारी और झारखंड प्रदेश राजीव गांधी विचार समिति का प्रभारी भी बनाया गया है।
एक युवा नेता को इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलना संगठन के भीतर उनके प्रति भरोसे को दर्शाता है। हालांकि किसी पद का वास्तविक महत्व तभी सामने आता है, जब उसे जनसंपर्क, संगठन और जमीन पर काम में बदला जा सके।
सुदूर गांव से राष्ट्रीय मंच तक की यात्रा
आशिका कुजूर की कहानी का सबसे अहम पक्ष उनकी ग्रामीण और आदिवासी पृष्ठभूमि है।
आज राजनीति में संसाधनों, आर्थिक ताकत और राजनीतिक संपर्कों की भूमिका पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। ऐसे माहौल में किसी दूर-दराज के गांव से आने वाले युवा के लिए राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाना अपने आप में बड़ी चुनौती है।
आशिका का राजनीतिक उभार यह बताता है कि अवसर मिलने पर गांव और आदिवासी समाज से आने वाली प्रतिभाएं भी बड़े मंच पर अपनी जगह बना सकती हैं।
उनकी कार्यशैली में सहजता और सरलता को भी उनके व्यक्तित्व की खासियत माना जाता है। राजनीति में केवल भाषण देना पर्याप्त नहीं होता। कार्यकर्ताओं, ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और आम लोगों के बीच सहज संवाद स्थापित करना किसी भी नेता के लिए बेहद जरूरी होता है।
राजनीति में शिक्षा और व्यापक दृष्टि की जरूरत
समय के साथ राजनीति भी बदल रही है। आज किसी नेता के लिए केवल संगठनात्मक पद या राजनीतिक नारे लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी बदलावों को समझने के लिए अध्ययन और व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है।
आदिवासी समाज के मुद्दे भी अब सिर्फ जल, जंगल और जमीन तक सीमित नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, तकनीक, महिला सशक्तीकरण, ग्राम स्वशासन, पर्यावरण, सांस्कृतिक पहचान और विकास में बराबरी की भागीदारी जैसे विषय भी उतने ही महत्वपूर्ण हो चुके हैं।
नई पीढ़ी के आदिवासी नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह समाज की परंपरागत चेतना को आधुनिक भारत की आकांक्षाओं से जोड़ सके। यदि यह संतुलन कायम होता है तो नेतृत्व केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नीतियों और विचारों को भी प्रभावित कर सकेगा।
‘गूंज’ और आदिवासी कांग्रेस की जिम्मेदारी
कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यक्रम ‘गूंज’ की राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी अपने आप में महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्तर के किसी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए संगठन के अलग-अलग स्तरों के बीच समन्वय, संवाद और व्यापक जनसंपर्क की जरूरत होती है।
इसी तरह आदिवासी कांग्रेस की राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी आसान नहीं है। भारत का आदिवासी समाज एकरूप नहीं है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में उसकी सामाजिक, भाषायी, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं।
ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को समझना और विविध परिस्थितियों के बीच साझा लोकतांत्रिक दृष्टि तैयार करना बड़ी जिम्मेदारी है। आशिका कुजूर के लिए यह जिम्मेदारी एक अवसर भी है और परीक्षा भी।
झारखंड की जिम्मेदारी और बड़ी राजनीतिक संभावना
झारखंड की राजनीति में आदिवासी समाज की भूमिका ऐतिहासिक रही है। जल, जंगल और जमीन के सवाल से लेकर अलग राज्य के आंदोलन तक, आदिवासी समाज ने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक स्वरूप को गहराई से प्रभावित किया है।
ऐसे प्रदेश में आदिवासी कांग्रेस और राजीव गांधी विचार समिति जैसी जिम्मेदारियां संभालना केवल संगठनात्मक दायित्व नहीं है। इसके लिए झारखंड के इतिहास, वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों और भविष्य की चुनौतियों को समझना भी जरूरी होगा।
राजीव गांधी की राजनीतिक सोच में गांव, पंचायत, युवा शक्ति और आधुनिक तकनीक को लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिखाई देता था। आज की परिस्थितियों में उस विचार को नए सामाजिक और तकनीकी बदलावों के साथ जोड़ना एक अलग चुनौती है।
आशिका कुजूर के लिए झारखंड इस दिशा में काम करने का महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है। उन्हें आदिवासी समाज के साथ-साथ युवाओं, महिलाओं, ग्रामीण समुदायों और गैर-आदिवासी समाज के बीच भी संवाद का दायरा बढ़ाना होगा।
राजेश्वरी सरोज दास की याद क्यों आती है?
आशिका कुजूर की राजनीतिक कार्यशैली को देखते हुए मुझे बार-बार राजेश्वरी सरोज दास की याद आती है। आदिवासी समाज से आने वाली राजेश्वरी सरोज दास का सार्वजनिक जीवन संघर्ष और राजनीतिक जिम्मेदारियों से भरा रहा। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में विधान परिषद सदस्य, विधायक तथा बिहार की कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं। आगे चलकर वह बिहार विधानसभा की अध्यक्ष भी बनीं।
मेरे अपने राजनीतिक जीवन की भी उनसे एक विशेष स्मृति जुड़ी है। जब मैं पलामू जिला कांग्रेस कमेटी में महामंत्री था, उस समय राजेश्वरी सरोज दास जिला कांग्रेस कमेटी की कोषाध्यक्ष थीं। इसलिए उन्हें केवल इतिहास के पन्नों में पढ़ने के बजाय करीब से देखने और उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने का अवसर मिला।
उनमें संघर्ष की क्षमता, संगठन की समझ, राजनीतिक दृढ़ता और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव स्पष्ट दिखाई देता था।
आशिका कुजूर में भी मुझे उसी तरह की ऊर्जा और संभावनाएं नजर आती हैं। बल्कि मुझे लगता है कि यदि वह इसी तरह आगे बढ़ती रहीं तो भविष्य में राजेश्वरी सरोज दास की विरासत से आगे अपनी अलग पहचान बनाने की क्षमता रखती हैं।
यह तुलना किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के योगदान को कम करने के लिए नहीं, बल्कि एक युवा नेतृत्व में दिखाई दे रही संभावनाओं को रेखांकित करने के लिए है।
आदिवासी महिला नेतृत्व की बदलती तस्वीर
भारतीय राजनीति में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसके बावजूद राजनीतिक संस्थाओं और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी को और मजबूत करने की जरूरत बनी हुई है। आशिका कुजूर जैसी युवा नेत्रियां इस बदलाव की नई तस्वीर पेश कर सकती हैं।
उनका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वह आदिवासी समाज से आती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि एक ग्रामीण और आदिवासी पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने राष्ट्रीय संगठनात्मक जिम्मेदारी तक अपनी जगह बनाई है।
उनकी यात्रा उन युवाओं और युवतियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है, जो सार्वजनिक जीवन और राजनीति में आने का सपना देखते हैं लेकिन संसाधनों की कमी को बड़ी बाधा मानते हैं।
पद से बड़ी होती है कार्यशैली
राजनीति में पद हासिल करना एक उपलब्धि हो सकता है, लेकिन उस पद को जनता के भरोसे में बदलना उससे कहीं बड़ी चुनौती है।
किसी युवा नेता की वास्तविक परीक्षा तब शुरू होती है, जब उसके कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी आती है। संगठन पद देता है, लेकिन स्थायी पहचान नेता की कार्यशैली और जनता के साथ उसके रिश्ते से बनती है।
आशिका कुजूर के सामने भी अब यही चुनौती है। उन्हें जमीन से जुड़े रहना होगा, सामान्य कार्यकर्ताओं से लेकर वरिष्ठ नेतृत्व तक संवाद मजबूत करना होगा और आदिवासी समाज के सवालों को व्यापक राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ना होगा।
उनकी भूमिका केवल कार्यक्रमों के संचालन तक सीमित न रहकर विचार और नीति के स्तर पर भी प्रभाव पैदा करे, यही उनके राजनीतिक सफर की अगली बड़ी कसौटी होगी।
युवा नेतृत्व के सामने अवसर और चुनौती
भारतीय लोकतंत्र की आने वाली राजनीति में युवा नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है। लेकिन केवल युवा होना पर्याप्त नहीं है। युवा ऊर्जा को अनुभव, अध्ययन, अनुशासन और सामाजिक संवेदना के साथ जोड़ना जरूरी है।
आशिका कुजूर के पास गांव की जमीन से आया अनुभव, आदिवासी समाज की सामाजिक पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय संगठन का मंच—तीनों मौजूद हैं। यदि इन तीनों का सही समन्वय हुआ तो उनकी राजनीतिक यात्रा आगे नई ऊंचाई हासिल कर सकती है।
अभी लंबा सफर बाकी है
आशिका कुजूर की राजनीतिक यात्रा अभी निर्माण के दौर में है। आगे उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना होगा और जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता को लगातार मजबूत करना होगा।
फिर भी राजनीति में किसी व्यक्ति की भविष्य की संभावनाओं की झलक उसकी वर्तमान कार्यशैली से मिलने लगती है। आशिका कुजूर में मुझे ऐसी ही संभावना दिखाई देती है।
मेरे लंबे राजनीतिक जीवन में अनेक प्रतिभाशाली लोगों को करीब से देखने का अवसर मिला है, लेकिन आशिका कुजूर जैसी तेज-तर्रार, सहज, सरल और समर्पित युवा नेत्री कम देखने को मिली हैं।
जशपुर के एक सुदूर गांव से शुरू हुई उनकी यात्रा आज राष्ट्रीय राजनीतिक फलक तक पहुंच चुकी है। यदि वह इसी सादगी, कर्मठता और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ती रहीं, तो आने वाले वर्षों में उनकी पहचान केवल एक युवा आदिवासी नेत्री तक सीमित नहीं रहेगी।
वह राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली महिला नेतृत्व के रूप में अपनी जगह बना सकती हैं।
राजनीति में भविष्यवाणी करना आसान नहीं होता। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनमें भविष्य की आहट वर्तमान में ही सुनाई देने लगती है। आशिका कुजूर में मुझे ऐसी ही आहट सुनाई देती है।
जशपुर की मिट्टी से निकली यह आवाज अगर लगातार जनसंघर्ष, अध्ययन और संगठनात्मक प्रतिबद्धता से जुड़ी रही, तो आने वाले समय में इसका प्रभाव छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमाओं से आगे बढ़ सकता है। यह राष्ट्रीय राजनीति में आदिवासी समाज की नई पीढ़ी की एक मजबूत आवाज बन सकती है। और शायद यही आशिका कुजूर की सबसे बड़ी राजनीतिक संभावना है।
लेखक: हृदयानंद मिश्र, एडवोकेट, स्तंभकार एवं सदस्य, हिन्दू धार्मिक न्यास बोर्ड, झारखंड सरकार।
रिपोर्ट : विश्वनाथ आनंद.
