उज्जैन शहर इन दिनों विकास और धार्मिक आयोजनों की तैयारियों के बीच एक संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 2028 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ को देखते हुए नगर निगम सड़कों को चौड़ा कर रहा है ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही सुचारू रहे। इसी काम के दौरान छत्री चौक स्थित शाही मस्जिद का एक हिस्सा भी प्रभावित होने वाला है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने 9 सितंबर 2026 को दो याचिकाओं को खारिज कर दिया और नगर निगम की कार्रवाई को कानूनी रूप से सही ठहराया।
हाईकोर्ट का फैसला क्या कहता है?
जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि नगर निगम की कार्रवाई कानून के दायरे में है, बड़े सार्वजनिक हित में है और इसमें कोई भेदभाव नहीं दिखता। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शहर की आबादी समय के साथ बढ़ी है। सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजन में करोड़ों भक्तों की सुविधा और सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। मस्जिद महाकालेश्वर मंदिर के लगभग सामने और क्षिप्रा नदी के करीब स्थित है। ऐसे में यातायात प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा प्राथमिकता है।
अदालत ने यह भी नोट किया कि नोटिस दिए गए, सुनवाई का मौका मिला और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया। याचिकाकर्ताओं के तर्कों को अदालत ने पर्याप्त नहीं माना।
सड़क चौड़ीकरण की योजना क्या है?
उज्जैन डेवलपमेंट प्लान 2035 के तहत कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर तक करीब डेढ़ किलोमीटर के रास्ते को 15 मीटर चौड़ा करने की योजना है। यह मार्ग शाही सवारी, पेशवाई और कुंभ के दौरान सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। नगर निगम का कहना है कि बाधा बनने वाले लगभग सभी निर्माण पहले ही हटाए जा चुके हैं। बाकी बचे हिस्से में शाही मस्जिद और उसके सामने वाली इमारत शामिल हैं।
शाही मस्जिद का कितना हिस्सा प्रभावित होगा?
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक प्रार्थना हॉल यानी जमात खाने का एक हिस्सा, 120 फीट ऊंची मीनार का कुछ भाग और मजार चौक शाही का हिस्सा प्रभावित होगा। नगर निगम ने अदालत में बताया कि कुल संरचना का दस प्रतिशत से भी कम हिस्सा हटेगा। सटीक वर्ग फीट या प्रतिशत का जिक्र ज्यादातर रिपोर्टों में नहीं मिलता, लेकिन सड़क की तरफ वाला हिस्सा ही चिन्हित है।
मस्जिद प्रबंधन इसे वक्फ संपत्ति बताता है और पुराने दस्तावेजों का हवाला देता है। 1925 के सिंधिया काल के पत्र और 1985 के राजपत्र का जिक्र किया जाता है। ज्यादातर विश्वसनीय रिपोर्टों में इसे सौ साल से अधिक पुरानी बताया गया है। शहर काजी की ओर से 650 साल पुरानी होने का दावा भी सामने आया है, हालांकि अदालत ने आयु को फैसले का आधार नहीं बनाया।

क्या सिर्फ मस्जिद को निशाना बनाया गया?
यह सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा था। याचिकाकर्ताओं ने भेदभाव का आरोप लगाया। लेकिन नगर निगम ने अदालत को बताया कि इसी सड़क पर पहले ही दस मंदिरों और एक मस्जिद के हिस्से हटाए जा चुके हैं। पूरे शहर में करीब अस्सी धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई हुई है। शाही मस्जिद के सामने वाली इमारत भी हटनी है। अदालत ने इसी आधार पर कहा कि मनमाना या अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।
सती गेट को लेकर भी चर्चा हुई। गेट को यथास्थिति में रखा गया है और दोनों तरफ से रास्ता बनाया जा रहा है ताकि आवागमन बाधित न हो। इसे तकनीकी समायोजन माना गया, विशेष छूट नहीं।
हुसामी मस्जिद का अलग मामला
गोपाल मंदिर के सामने हुसामी मस्जिद का भी कुछ हिस्सा प्रभावित है। बोहरा समाज ने सहमति से करीब साढ़े आठ फीट हिस्सा खुद हटाना शुरू किया। मस्जिद की कुल चौड़ाई करीब तीस फीट बताई जाती है। नीचे की कुछ दुकानें भी प्रभावित होंगी। यह कार्रवाई स्वैच्छिक सहयोग का उदाहरण बनकर सामने आई।
कानूनी पहलू और आगे की राह
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 25 धर्म के अभ्यास की आजादी देता है, लेकिन किसी खास जगह से बंधा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि मस्जिद वाली जमीन के अधिग्रहण से धार्मिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाता। मध्य प्रदेश म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट के सेक्शन 305 के तहत सड़क लाइन तय होने के बाद संबंधित जमीन नगर निगम के पास चली जाती है।
“बुलडोजर जस्टिस” का सवाल भी उठा। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में नोटिस दिए गए और सुनवाई हुई। इसलिए प्रक्रिया का पालन हुआ।
मस्जिद समिति के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला है। फिलहाल नगर निगम कार्रवाई आगे बढ़ा सकता है। शहर काजी ने धार्मिक स्थलों को न छेड़ने की अपील की है और समान व्यवहार की बात कही है। सोशल मीडिया पर कई दावे चल रहे हैं, लेकिन अदालती रिकॉर्ड और आधिकारिक बयान यही तस्वीर पेश करते हैं कि कार्रवाई विकास योजना और सार्वजनिक हित के नाम पर हो रही है।
यह मामला विकास, धार्मिक संवेदनशीलता और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन की परीक्षा है। उज्जैन जैसे प्राचीन शहर में सिंहस्थ जैसी विशाल आयोजन की तैयारी आसान नहीं होती। अदालत ने बड़े सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी है। अब देखना यह है कि जमीन पर कार्रवाई कैसे होती है और दोनों पक्ष कितना सहयोग देते हैं।
रिपोर्ट : इस्मा टाइम्स न्यूज़ डेस्क.
