झारखंड, 17 सितंबर 2026: आजकल आम लोगों के बीच अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है कि अगर राजनीति में ज्यादा पढ़े-लिखे और डिग्रीधारी लोग आ जाएं, तो देश की तस्वीर तेजी से बदल सकती है। शिक्षा को लेकर ऐसी उम्मीद स्वाभाविक है, लेकिन क्या केवल बड़ी-बड़ी डिग्रियां किसी व्यक्ति की ईमानदारी, संवेदनशीलता और नैतिकता की गारंटी हो सकती हैं? यही सवाल इस बहस को थोड़ा और गहराई से देखने की जरूरत पैदा करता है।
यह बात साफ है कि शिक्षा का विरोध करने का कोई सवाल ही नहीं है। शिक्षा किसी भी सभ्य और विकसित समाज की बुनियाद होती है। लेकिन शिक्षा और चरित्र को एक ही चीज मान लेना शायद सही नहीं होगा। किसी व्यक्ति के पास कितनी डिग्रियां हैं, यह उसकी शैक्षणिक योग्यता बताती हैं; लेकिन वह अपने ज्ञान और अधिकार का इस्तेमाल किस तरह करता है, यह उसके चरित्र और नैतिक मूल्यों से तय होता है।
अगर आजादी के शुरुआती दौर की राजनीति को देखा जाए तो उस समय बड़ी संख्या में ऐसे नेता सार्वजनिक जीवन में आए, जिनकी पहचान केवल उनकी औपचारिक शैक्षणिक योग्यता से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन, संघर्ष, त्याग और सामाजिक सरोकारों से बनी थी। उस दौर को याद करने वाले लोग अक्सर नेताओं के सादगीपूर्ण जीवन और सार्वजनिक सेवा की भावना का उल्लेख करते हैं।
समय के साथ राजनीति और प्रशासन में उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की भागीदारी बढ़ी। देश-विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े लोग भी सार्वजनिक जीवन में पहुंचे। इसके बावजूद केवल शिक्षा के बढ़ने से भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण जैसी समस्याएं खत्म नहीं हुईं। यही स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि ज्ञान और चरित्र आखिर दो अलग-अलग चीजें क्यों हैं।
अगर केवल शिक्षा ही ईमानदारी की गारंटी होती, तो समाज में उच्च शिक्षित लोगों से जुड़े भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण के मामले कभी सामने नहीं आते। डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी और दूसरे पेशेवर कठिन परीक्षाएं पास करके विशेषज्ञता हासिल करते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता अपने आप उसके नैतिक आचरण की गारंटी नहीं बन जाती।
असल सवाल यह है कि ज्ञान का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति अगर गलत रास्ते पर चलता है तो उसका प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठा अत्यधिक शिक्षित व्यक्ति यदि अपने ज्ञान और अधिकार का गलत इस्तेमाल करे, तो उसके फैसलों का असर कहीं व्यापक हो सकता है।
इसलिए राजनीति ही नहीं, प्रशासन और समाज के हर क्षेत्र में शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और नैतिक मूल्यों को भी महत्व देना जरूरी है। केवल रोजगार हासिल करने के लिए शिक्षा प्राप्त करना और एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए शिक्षा हासिल करना—इन दोनों उद्देश्यों में बड़ा अंतर है।
जब शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ अच्छी नौकरी या बेहतर आमदनी तक सीमित हो जाता है और चरित्र निर्माण पीछे छूट जाता है, तब ज्ञान और नैतिकता के बीच दूरी पैदा हो सकती है। ऐसे में देश और समाज को केवल शिक्षित दिमागों की नहीं, बल्कि ऐसे लोगों की भी जरूरत होती है जो अपने ज्ञान, पद और अधिकार का इस्तेमाल ईमानदारी और जनहित की भावना के साथ करें।
लेखक : झारखंड के सुप्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक एवं राष्ट्रीय आयुर्वेद रक्षा एवं विकास मंच के सदस्य हैं।
प्रेषक : विश्वनाथ आनंद.
